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स्मृति शेष : कवि और कविता : पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे
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पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे से मेरे आत्मीय संबंध रहे. ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ {फरवरी-2013} पत्रिका ने उनके साहित्यिक योगदानों को रेखांकित करते हुए उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर मेरे संयोजन-संपादन में एकाग्र अंक {हास्यश्री पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे} प्रकाशित किया गया था. एकाग्र अंक के संदर्भ में मेरी मुलाकात उनसे अनेकों बार रायपुर, दुर्ग में उनके निवास में होते रही. उन्होंने मुझे अपनी सभी कृति भेंट में दी. उनके असमय निधन से मैं नि:शब्द हो गया. लाईब्रेरी से उनकी सभी कृतियों को निकाल कर फिर से पढ़ने का मन हुआ. एक कृति ‘सवाल ही सवाल है’ से कुछ हास्य-व्यंग्य कविताएँ आप पाठकों के लिए आज उन्हें शत् शत् नमन करते हुए प्रकाशित कर रहा हूँ. – प्रदीप भट्टाचार्य, संपादक
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पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे का जन्म छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिला- दुर्ग में 8 अगस्त 1953 को हुआ था, उनके पिता स्व. गर्जन सिंह दुबे भी कवि थे. साहित्यिक परिवेश में जन्में उन्हें वर्ष-2010 में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से अलंकृत किया गया था. देश के अनेकों राष्ट्रीय सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुए. काका हाथरसी स्मृति हास्य रत्न सम्मान, ओम प्रकाश आदित्य सम्मान, अट्ठाहस सम्मान, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सम्मान, व्यंग्यश्री सम्मान. अंतर्राष्ट्रीय सम्मान में अमेरिका के ‘ओहियो’ राज्य के गवर्नर द्वारा लीडिंग इंडियन पोयट सम्मान और मस्कट ओमान में भारत के राजदूत द्वारा श्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान से नवाजा गया.

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पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे भारत के अधिकांश शहरों में अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किए. गणतंत्र दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से अनेकों बार काव्य पाठ किए. विदेशों में भी काव्य पाठ करते हुए भारत का नाम रौशन किया. अमेरिका, दुबई, शारजाह, अज़मान, अरब देश, इंडोनेशिया, जकार्ता, मस्कट ओमान आदि-आदि. दिल्ली दूरदर्शन, आकाशवाणी के साथ-साथ देश के प्रमुख टीवी चैनलों में भी काव्य पाठ किये. राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्रों {जागरण,भास्कर,नवभारत} द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता रहा.
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पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे के कुछ प्रमुख कृति-
मिथक मंथन/किस पर कविता लिखूँ/नवा सुरूज/मोर पेंड़वा गंवागे/पीरा/दो पांव का आदमी/सवाल ही सवाल है/कविता धरातल पर/हम बोलते क्यों नहीं?/झूठ का परिणाम और सीडी में चेला बोलिस गुरु.
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26 जून, 2025 को उनके निधन पर शत् शत् नमन के साथ उनकी कृति ‘सवाल ही सवाल है’ से कुछ चुनिंदा कविताएँ-

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लाईन में आइये

लोग कहते हैं- जिंदगी के मुल्य/बहुत बड़े हैं/परंतु हम तो जन्म से मृत्यु तक लाईन में खड़े हैं.
मेरी माँ/अस्पताल में लाईन में/खड़ी थी/जब मेरे पैदा होने की/घड़ी थी/जन्म के बाद/पिताजी को/लाईन में खड़ा पाया/तब स्कूल में मेरा/दाखिला हो पाया/फिर रोजगार दफ़्तर की लाईन/नौकरी के लिए लाईन/नौकरी में जाने के लिए/बस-ट्रेन में लाईन/इतनी लाईन हो गई कि/मेरी जिंदगी/ऑउट ऑफ लाईन हो गई/आपको कभी उस/दर्द का एहसास होता है/जब हज़ारों बोरा धान/पैदा करके किसान/चावल के लिए/लाईन में खड़ा होता है.
पर लाईन से रहने में/और लाईन में रहने से/आदमी आगे बढ़ गया/लक्ष्मण ने खींची/जानकी के आगे लाईन/पार कर लिया/तो हरण हो गया.
पाकिस्तान और भारत/के बीच लाईन/भारत ने मर्यादा निभाई/पाकिस्तान ने मिटाई/पाकिस्तान को कबड्डी का/छोटा-सा नियम/समझ में नहीं आता है/लाईन छू जाय/तो खिलाड़ी आउट हो जाता है/छोटे-छोटे चीनी/सीमा की बड़ी लाईन मिटायेंगे/अगर भारत ने/चाइना का माल/लेना बंद कर दिया/तो और छोटे हो जायेंगे/इसलिए एक चेतावनी/चीन और पाकिस्तान के नाम/लाईन से रहें/लाईन में रहें.
अवाम को एक बात/समझाओ/दूसरे की लाईन मिटाओ मत/अपनी लाईन बढ़ाओ/अगर आप दूसरे की/लाईन मिटायेंगे/तो अपनी नज़र में/गिर जायेंगे.
शिकागो की छाती में/स्वामी विवेकानंद ने/’माई डियर ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स’/कहकर इतनी बड़ी लाईन खड़ी की थी/कि पूरे विश्व को/ताली बजानी पड़ी थी.
लाईन का मतलब/होता है अनुशासन/व्यवस्था और संस्कार/इसे करना चाहिए-स्वीकार/लोग कहते हैं/हम क्यों खड़े हैं/हम तो वीआईपी हैं/आपने भी क्या बात कही/कौन कहता है/आपको लाईन में/खड़े होने की जरूरत नहीं/आप बड़े लोग हैं/अगर आप लाईन में/खड़े हुए तो/हमारी इज़्ज़त बढ़ जायेगी/और हमारे आपके बीच/जो लाईन है/वह अपने आप/मिट जायेगी.
लाईन का मतलब/समानता हमजोली/न कोई राजा भोज/न कोई गंगू तेली/हमारी कोशिश होती है/कितनी भी उठा-पटक/करनी पड़े/पर लाईन में/खड़ा मत होना पड़े/आखिर क्यों? लाईन में खड़े होने से/आप छोटे नहीं हो जायेंगे/दिमाग की धूल पौंछा/खास हो ठीक है/आम लोगों के साथ/खड़े होने की सोचो.
याद रखें/कल जब आप/लाईन तोड़कर/आगे जायेंगे/तो पीछे से किसी को/चिल्लाता पायेंगे/भाई साहब! लाईन में आइये/ये आपका सम्मान है/या अपमान/समझ गये श्रीमान! इसलिए मुस्कुराइये/और लाईन में आइये. यही हर सुबह का हाल है/ये भी एक सवाल है.
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पद-यात्रा या पद के लिए यात्रा

पद-यात्रा चल रही है/किसलिए/पद पाना है/इसलिए/आज पद- यात्रा का/बहुत ज़ोर है/आगे नेता चल रहे हैं/पीछे कारों का शोर.
भारत की जनता/रोज़ पैदल चलती है/नेताओं को पद पाने के लिए/ कभी-कभी पद-यात्रा करनी /पड़ती है.
अगर भगवान विष्णु/वामन अवतार में/एक पांव में-स्वर्ग/एक पांव में-धरती/नाप सकते हैं/तो आप/पद-यात्रा करके/दिल्ली की कुर्सी/पा सकते हैं.
पद-यात्रा का/आँखों देखा हाल/टी.व्ही. पर दिखाया जाता है- नेता जी/यहाँ सोये/यहाँ खाये/यहाँ नहाये/यहाँ गये/सबकुछ/बतलाया जाता है.
पहले किसी/मुद्दे पर पद-यात्रा/होती थी/अब पद-यात्रा में/मुद्दों की/तलाश होती है.
हमारे पूर्वज/पैदल चलकर/चारों धाम जाते थे/पुण्य कमाकर/आते थे/अब नेता पद-यात्रा में जाते हैं/वोट कमाकर आते हैं.
दिये तेल से नहीं/पानी से भी/जलते है/लोगों को आश्चर्य है/ये सियासती राजकुँवर/पैदल भी चलते हैं/पद-यात्रा/रथ-यात्रा/सब व्यर्थ यात्रा/गरीबों के दिलों/तक पहुंचें अगर/हो जायेंगी/ तीर्थ-यात्रा.
जनता सोचती है/ये क्या कम है/यह सोचती है/पैदल तो हम भी चलते हैं/चलने के लिए/पैरों का होना/ज़रूरी है/पर सांप सरकते हैं/ये मजबूरी है/पद-यात्रा के ब हाने/अपना ग्लूकोज़/घटा लिया/और गरीबों का/डल्ला नमक खा लिया.
कोई भी यात्रा/व्यर्थ नहीं की जाती/हर यात्रा का/उद्देश्य होता है/ये अलग बात है/प्रत्यक्ष होता है/कुछ का/परोक्ष होता है.
ये पद-यात्रा कर/पद-चिन्ह/छोड़ जाते हैं/हम पद-चिन्हों के/अनुगामी होकर/भूल-भुलैंया में/खो जाते हैं/हम समझ नहीं पाते/ये समीकरण/जोड़ जाते हैं.
इसी बात का मलाल है
ये भी एक सवाल है?
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लोन ले लो लोन

पद-यात्रा चल रही है/किसलिए/पद पाना है/इसलिए/आज पद- यात्रा का/बहुत ज़ोर है/आगे नेता चल रहे हैं/पीछे कारों का शोर.
भारत की जनता/रोज़ पैदल चलती है/नेताओं को पद पाने के लिए/ कभी-कभी पद-यात्रा करनी /पड़ती है.
अगर भगवान विष्णु/वामन अवतार में/एक पांव में-स्वर्ग/एक पांव में-धरती/नाप सकते हैं/तो आप/पद-यात्रा करके/दिल्ली की कुर्सी/पा सकते हैं.
पद-यात्रा का/आँखों देखा हाल/टी.व्ही. पर दिखाया जाता है- नेता जी/यहाँ सोये/यहाँ खाये/यहाँ नहाये/यहाँ गये/सबकुछ/बतलाया जाता है.
पहले किसी/मुद्दे पर पद-यात्रा/होती थी/अब पद-यात्रा में/मुद्दों की/तलाश होती है.
हमारे पूर्वज/पैदल चलकर/चारों धाम जाते थे/पुण्य कमाकर/आते थे/अब नेता पद-यात्रा में जाते हैं/वोट कमाकर आते हैं.
दिये तेल से नहीं/पानी से भी/जलते है/लोगों को आश्चर्य है/ये सियासती राजकुँवर/पैदल भी चलते हैं/पद-यात्रा/रथ-यात्रा/सब व्यर्थ यात्रा/गरीबों के दिलों/तक पहुंचें अगर/हो जायेंगी/ तीर्थ-यात्रा.
जनता सोचती है/ये क्या कम है/यह सोचती है/पैदल तो हम भी चलते हैं/चलने के लिए/पैरों का होना/ज़रूरी है/पर सांप सरकते हैं/ये मजबूरी है/पद-यात्रा के ब हाने/अपना ग्लूकोज़/घटा लिया/और गरीबों का/डल्ला नमक खा लिया.
कोई भी यात्रा/व्यर्थ नहीं की जाती/हर यात्रा का/उद्देश्य होता है/ये अलग बात है/प्रत्यक्ष होता है/कुछ का/परोक्ष होता है.
ये पद-यात्रा कर/पद-चिन्ह/छोड़ जाते हैं/हम पद-चिन्हों के/अनुगामी होकर/भूल-भुलैंया में/खो जाते हैं/हम समझ नहीं पाते/ये समीकरण/जोड़ जाते हैं.
इसी बात का मलाल है
ये भी एक सवाल है?
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chhattisgarhaaspaas
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