- Home
- Chhattisgarh
- छत्तीसगढ़ – दुर्ग जिले की धड़कन मैं शिवनाथ हूँ : मेरा प्रकृति प्रेम जब मुझे शिवनाथ नदी के तट पर ले गया और मैं वहां का विहंगम दृश्य देखकर में चकित हो गई- नूरस्सबाह ‘सबा’
छत्तीसगढ़ – दुर्ग जिले की धड़कन मैं शिवनाथ हूँ : मेरा प्रकृति प्रेम जब मुझे शिवनाथ नदी के तट पर ले गया और मैं वहां का विहंगम दृश्य देखकर में चकित हो गई- नूरस्सबाह ‘सबा’

मेरा प्रकृति प्रेम जब मुझे शिवनाथ
नदी के तट पर ले गया तो वहां का विहंगम दृश्य देखकर में चकित हो गई।
तेज़ बहती नदी की जलधारा अपने आँचल में शहर भर की गंदगी को समेटे हुए अपना रौद्र रूप धारण
करके इस तरह बह रही थी जैसे वो मनुष्यों द्वारा अपने ऊपर की गई मनमानियों से नाराज़ हो ।
और इसके बारे में लिखने को मेरी
कलम चल गई।
चलिये हम शिवनाथ नदी के भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व की तरफ़ नज़र डालते हैं।
शिवनाथ नदी, छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की जीवनरेखा और धड़कन के रूप में जानी जाती है। यह नदी न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि इस क्षेत्र की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन का भी अभिन्न हिस्सा है। महानदी की सबसे बड़ी सहायक नदी के रूप में, शिवनाथ नदी छत्तीसगढ़ के कई जिलों से होकर बहती है, लेकिन दुर्ग जिले में इसका विशेष महत्व है। यह नदी न सिर्फ जल आपूर्ति और सिंचाई का स्रोत है, बल्कि यह स्थानीय समुदायों के लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी रखती है।
शिवनाथ नदी का उद्गम महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के गोडरी गांव से होता है, हालांकि कुछ स्रोत इसे राजनांदगांव जिले की पानाबरस पहाड़ी से भी जोड़ते हैं। यह नदी लगभग 290 से 470 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव, दुर्ग, बेमेतरा, मुंगेली, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जिलों से होकर बहती है और अंततः शिवरीनारायण में महानदी में मिल जाती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में लीलागर, मनियारी, आगर, हांप, खारून, अरपा, आमनेर, सकरी, खरखरा, तांदुला और जमुनिया शामिल हैं। दुर्ग जिले में यह नदी जिले को दो भागों में बांटती है और इसकी तेज धारा और रेतीले किनारे इसे विशिष्ट बनाते हैं।

दुर्ग जिला, जो छत्तीसगढ़ के औद्योगिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में जाना जाता है, शिवनाथ नदी के किनारे बसा है। इस नदी ने जिले की कृषि, मछली पालन और जल विद्युत उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मोंगरा बैराज परियोजना, जो राजनांदगांव में शिवनाथ नदी पर संचालित है, क्षेत्र में सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। यह नदी लगभग 20% कृषि क्षेत्र को सिंचित करती है, जिससे धान, गेहूं और दलहन जैसे फसलों का उत्पादन संभव होता है। इसके अलावा, नदी का उपयोग परिवहन के लिए भी किया जाता है, विशेष रूप से मानसून के दौरान जब जलस्तर बढ़ जाता है।
हालांकि, शिवनाथ नदी के सामने कई चुनौतियां भी हैं। हाल के वर्षों में, औद्योगिक और कृषि अपशिष्टों के कारण नदी में प्रदूषण की समस्या गंभीर हो गई है। यह न केवल नदी के जल को दूषित कर रहा है, बल्कि जलीय जीवों और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहा है। इसके अलावा, मानसून के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे तटीय क्षेत्रों में नुकसान होता है।
शिवनाथ नदी का सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है। इसके किनारे बसे गांवों और शहरों, जैसे दुर्ग, राजनांदगांव और मदकू द्वीप, में यह नदी कई त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों का केंद्र है। मदकू द्वीप पर 11वीं-12वीं शताब्दी के कलचुरी कालीन मंदिर इस नदी की ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाते हैं। इसके अलावा, नदी से जुड़ी आदिवासी कथाएं, जैसे शिवनाथ और पारू की प्रेम कहानी, इसकी सांस्कृतिक समृद्धि को और बढ़ाती हैं।
निष्कर्षतः, शिवनाथ नदी दुर्ग जिले की आत्मा है। यह नदी न केवल जल और जीवन का स्रोत है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को भी मजबूत करती है। हालांकि, इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। प्रदूषण नियंत्रण, बाढ़ प्रबंधन और नदी के किनारों की सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं, ताकि यह जीवनदायिनी नदी अपनी धड़कन को बरकरार रख सके।
और अंत में कविता की इन पंक्तियों से अपनी बात ख़त्म करती हूँ।

उफनती नदी ने जब आवाज़ लगाई
मैं कदमों को अपने न रोकने पाई
कुदरत की ये रचना यूं मन को भाई
लिखने से खुद को ‘सबा’ रोक न पाई.

[ • शायरा नूरस्सबाह ‘सबा’ देश की सुप्रसिद्ध लेखिका एवं कवयित्री है.•संपर्क : 99267 72322 ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)