कहानी : ‘पीहू’ – डॉ. दीक्षा चौबे
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पीहू
– डॉ. दीक्षा चौबे

उसने मेरी आँखों में देखा और कहा – “हाँ “। हवाओं में सप्तरंगी सुर सजने लगे , धड़कन में प्रेम की रागिनी बज उठी । साँसें संदली हो उठीं जब पीहू ने प्रणय का प्रेम निवेदन स्वीकार कर लिया । रास्ता वही था जिस पर थोड़ी देर पहले गुजरे थे पर अभी वहाँ खुशियों के रतनारे गुलाब खिल उठे थे , उत्साह और उमंग के विविध रंग इस पल को मधुरिम बना रहे थे , ख्वाहिशों के आसमान में केसर की रंगोली सज उठी थी । पिछले पाँच वर्षों से पीहू और प्रणय एक ही ऑफिस में कार्य कर रहे थे । एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त तो वे थे ही अब जीवन-पथ पर भी हमसफ़र बनने जा रहे थे । इसके पहले भी कई बार प्रणय ने पूछा था पर पीहू इसके लिए तैयार नहीं थी ।
दो वर्ष पहले पीहू की शादी होकर एक माह में ही टूट गई थी । मम्मी-पापा ने खूब देखभाल कर उसका रिश्ता तय किया था पर विवाह के बाद जल्दी ही उनकी संकीर्ण मानसिकता दिखने लगी थी । छोटी-छोटी बातों पर पीहू और राजीव के बीच झगड़े होने लगे । राजीव माँ का अंधभक्त था वह जैसा कहतीं वह वैसा ही करता । उसकी अपनी कोई सोच नहीं थी , पत्नी के पक्ष में वह बिल्कुल भी खड़ा नहीं होता उसके सही होने पर भी । विवाह के बाद मधुर मिलन के जो सबसे अच्छे पल होते हैं वही उन्हें एक करने में असफल रहे तो आगे कुछ अच्छा होने की क्या उम्मीद रहती । उन्होंने पीहू को लगभग कैदी बनाकर रखा था , उससे उसका मोबाइल छीन लिया था ताकि वह अपने पापा-मम्मी से बात न कर सके । यातना के वे पल बहुत दिनों तक पीहू को त्रास देते रहे । किसी तरह घर तक ये बातें पहुँची तो पापा उसे वापस ले गए और फिर उसे नहीं भेजने पर अड़ गए । ऐसे परिवार में वे अपनी बेटी को फिर से भेजकर उसकी जान का खतरा नहीं उठा सकते थे । जहाँ मानवता नहीं वहाँ किसी प्रकार के हृदय-परिवर्तन की गुंजाइश नहीं हो सकती ,यह सोचकर उन्होंने बिना देरी किये तलाक के लिए केस दर्ज कर दिया । पहले तो राजीव और उसके परिवार ने समझौता करने का प्रयास किया परंतु पीहू के पापा माने ही नहीं । उन्होंने एक माह में पीहू की जो हालत देखी वे बहुत डर गए थे । शरीर का घाव तो समय के साथ भर जाता है लेकिन मन के घावों को भरने में वक्त लगता है । पीहू बहुत मुश्किल से सँभल पाई । परिवार , दोस्तों के प्यार ने उसे संबल प्रदान किया और उसकी जिंदगी पुनः पटरी पर लौटी । वह सामान्य होकर अपने काम पर ध्यान देने लगी ।
प्रणय पहले से ही पीहू को पसंद करता था परंतु उसे अपने मन की बात कभी कह नही सका और कुछ कह पाता उसके पहले उसकी शादी तय हो गई । वह बहुत शांत स्वभाव का और समझदार इंसान था ।
कहीं पीहू गलत न समझ ले कि वह उसके दुखी मन पर सहानुभूति के फाहे रखना चाह रहा है ,उसने तुरंत अपने प्यार की बात उसे नहीं बताई । हमारा मन जिस स्थिति में रहता है हम उसी के नजरिए से संसार के हर क्रियाकलाप को देखना चाहते हैं । यदि मन उदास हो तो खिले हुए फूल भी हमें उदास लगते हैं , चिड़िया आपस में कलह करती नजर आती है , प्रकृति की कोई बात हमें खुशी प्रदान नही करती ।
वक्त ही सबसे बड़ा मलहम है और हमारा कर्मक्षेत्र टॉनिक जो हमें ऊर्जान्वित कर जीने के तौर-तरीके सिखाता है । बड़े से बड़ा घाव वक्त के बहाव में भर जाता है । जैसे-जैसे हम अपनी दिनचर्या में व्यस्त होने लगते हैं , हमारा ध्यान अपनी तकलीफों से हटने लगता है और हम भविष्य की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखने लगते हैं । उम्मीद की पतवार ही मनुष्य को डूबने से बचाती है और निराशा की गहराईयों से बाहर निकाल लाती है । धीरे-धीरे पीहू सहज होने लगी थी…पतझड़ के बाद आने वाले नए पल्लवों की तरह उसका मन उमंग और खुशी के रंगों से सराबोर होने लगा था , ख्वाहिशें अंगड़ाई लेकर सुनहरे ख्वाब सजाने लगीं थीं और पलकों पर खुशियों की तितलियाँ नर्तन करने लगीं थीं तब उसे अपने आजू-बाजू के लोग दिखने लगे थे । जो उसकी परवाह कर रहे थे , उसकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखते थे और जिन्होंने उसे इस नए संसार में प्रवेश करने में मदद की थी ।
प्रेम स्वयं ही अपनी ओर खींच लेता है , अपनी उपस्थिति का आभास करा देता है प्रणय के प्रेम ने पीहू को अपने होने का एहसास करा दिया था । टेबल पर प्रतिदिन रखे जाने वाले गुलाबों की खुशबू पीहू की जिंदगी में महक घोल रही थी , उसे आगे बढ़ने का न्यौता दे रही थी । और फिर एक दिन जब कैंटीन में प्रणय ने पीहू से पूछा –”मुझसे शादी करोगी ? ” पीहू ने कह दिया “हाँ ” ।
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