कविता आसपास : तारकनाथ चौधुरी
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सशंकित मैं

इस अपरिचित शहर में
रहना तो तय कर लिया है
किंतु मन में एक अनिश्चितता की
कचोट लिए
कि विपद में किसे पुकारूँगा?
खुशी के क्षण में किसके साथ
गुनगुनाऊँगा गीत हाथों में हाथ लिए?
निकल पडा़ हूँ
पुरानी आदत के वशीभूत
प्रात भ्रमण के लिए
आँखों में आशा,
हृदय में विश्वास
और पग में प्रयास….
लौटते वक्त चाहूँगा मैं
मेरे हाथों में हो किसी का हाथ
मुस्कुराते पूछे कोई मेरी बात
ताकि छोड़ आऊँ
मध्य पथ पर ही
समस्त आशंकाओं को
और प्रत्याशाओं के नव पल्लवों से
द्वार पर वंदनवार सजा सकूँ।
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तस्वीर

जाने किसने
उकेरी है यह तस्वीर?
संभवत: ढूंढता होगा
जीवन की जीवंत परिभाषा.
रहने को घर,
प्रेम परस्पर, आत्मनिर्भर,
प्राप्ति में संतुष्टि,
पराये धन पर न कुदृष्टि
नयन दर्पण सा,
अधर मुसकाता
यही तो है
जीवन की परिभाषा.
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• संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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