स्वर्ग का न्याय : महेश की आत्मकथा – लेखक शायर नावेद रज़ा दुर्गवी

कुछ कहानियाँ ज़मीन पर नहीं, आसमानों में लिखी जाती हैं। वे केवल कागज़ पर नहीं, आत्माओं की स्मृति में दर्ज होती हैं। यह कहानी है महेश की — एक ऐसे मानव की, जिसकी पवित्रता, करुणा और सच्चाई ने स्वयं स्वर्ग के नियमों को भी चुनौती दे दी। यह कहानी नहीं, एक आत्मा की संपूर्ण यात्रा है — पीड़ा से पवित्रता तक, तिरस्कार से देवत्व तक।
आसमान पर एक अजीब सी जंग हो गई — वो भी एक मानव बालक के लिए, जो कुछ दिनों पहले स्वर्ग में ईश्वर की आज्ञा से आया था। मगर पाँच अप्सराओं में इतनी लड़ाई हुई कि किसी के पर, किसी के पैर और शरीर घायल हो गए। मामला इतना बढ़ गया कि अप्सराओं की रानी और ईश्वर के दरबार में इस विषय पर फैसला लेना पड़ा।
इन पाँचों अप्सराओं ने अपनी-अपनी चाहत महेश के लिए जताई — क्यों करती हैं, कैसे करती हैं, ये सब बताने में ईश्वर को भी महेश की ज़िंदगी पुनः विस्तार से सुननी पड़ी। क्योंकि यह प्रेम अब एक असामान्य रूप ले चुका था।
ईश्वर ने आदेश दिया – “हम महेश, तुम्हारी धरती पर बीती ज़िंदगी जानना चाहते हैं, तभी इस समस्या का हल हो सकेगा।”
महेश मुस्कुराते हुए बोला, “मेरी जन्म कुंडली और जीवन का लेखा-जोखा तो आपके पास है प्रभु जी, फिर भी जो आज्ञा…”
अब सुनिए महेश की ज़ुबानी — जो ईश्वर की सभा में उपस्थित महाज्ञानियों की भी आंखें नम कर गई।
मैं महेश, एक बड़े परिवार की छोटी सी ज़िंदगी का वह हिस्सा हूँ जो हृदय में बसा है।
एक माँ-बाप और दूर में बड़ा भाई रमेश — दिल में चाह तो थी लेकिन आंखों से देखने का मौका कभी नहीं मिला।
परिवार में तीन चाचा, चाची, उनके बच्चे, बाबा-दादी भी जीवित थे। सब कुछ होते हुए भी महेश ने अपने जीवन के बीस साल खाली ही बिताए। क्योंकि पिता की आदतें ही ऐसी थीं — नशा, गालियाँ, दूसरों को नीचा दिखाना, हर बात में तुच्छता।
माँ हर रोज़ अत्याचार सहती, दूसरे घरों में काम करके पेट पालती — मेरा, अपना और अपने पति का।
क्योंकि माँ ने अपनी पसंद से शादी की थी — उसी दिन से मायके का दरवाज़ा बंद हो गया। माँ ने किस्मत पर कालिख पोत ली थी।
माँ जब गर्भवती थीं, भाई सातवें महीने में पैदा हो गया। उसका इलाज कराने के लिए दादाजी से मदद माँगी — मगर पहले मना कर दिया। बाद में कहा – “अगर यह बच्चा चाहिए, तो हमें दे दो। बहू रानी राज़ी हो तो उसे छोड़ दो, और फिर कभी हमारे दरवाज़े पर मत आना।”
माँ के पास इलाज के पैसे नहीं थे, आँसू पीकर बेटे को दादाजी को सौंप दिया। आज वो भाई एक अच्छी औलाद बनकर परिवार में है।
फिर माँ के गर्भ में मैं आया — नई उम्मीद जगी।
मैं इतना सुंदर हुआ कि आस-पास के लोग मुझे देखने आते। पर दोनों परिवारों ने हमारी दहलीज़ नहीं लांघी। माँ मुझे पाकर खुश रहने लगी — जैसे उसे जीने का सहारा मिल गया।
चार साल बाद मेरी बहन पैदा हुई — मेरी माँ की परछाईं। समय बीतता गया, पिता का ज़ुल्म बढ़ता गया। माँ अपना पेट काट कर हमें खिलाती रही।
फिर जब मैं 11 साल का और बहन 7 साल की थी, बहन बीमार हो गई — दिल में सुराख था। इलाज के लिए लाखों चाहिए थे। पिता के पास शराब के लिए पैसे थे, बहन के लिए नहीं।
बहन की तबीयत बिगड़ती गई और एक दिन वो स्वर्ग सिधार गई। प्रभुजी, आपने अपनी दी हुई अमानत वापस ले ली।
अब मैं ही माँ का सहारा था। पढ़ाई में अच्छा था। माँ जिनके यहाँ काम करती थी, उन्होंने मेरी पढ़ाई का ज़िम्मा उठाया। कॉलेज तक पहुंचा।
मैंने जीवन में कभी किसी स्त्री को गलत दृष्टि से नहीं देखा। माँ-बहन का ही रिश्ता रखा। धर्म-कर्म में लगा रहा। यही माँ की सीख थी — और शायद इसी ने मुझे स्वर्ग तक पहुँचा दिया।
एक दिन जब मैं सड़क पर पैदल चल रहा था, एक नशे में हाईवा चालक ने मुझे कुचल दिया। जब आँख खुली, मैं अस्पताल में था। पहली बार पिता की आँखों में आँसू देखे। माँ मेरे पैरों में गिरी हुई थी।
डॉक्टर बोले – “पैरों में ज़हर फैल गया है, काटना पड़ेगा। वरना जान को खतरा है।”
पैसे नहीं थे। उस वक्त पिता को अपनी सारी गलतियाँ याद आईं — समझ आया कि नशे ने सब बर्बाद कर दिया।
माँ कुछ समय के लिए मानसिक संतुलन खो बैठी। रोते हुए पिता से पूछा — “इन सबका जिम्मेदार कौन?”
पिता चुप थे — पर अब उनकी आत्मा जाग चुकी थी। पूरे परिवार से माफ़ी मांगी। दादाजी, चाचा-चाची सब लौट आए। माँ भी मायके गई — सबने उसे माफ़ कर दिया।
मैंने दो बिछड़े परिवारों को जोड़ दिया। मगर ज़हर बहुत फैल गया था — डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद मैं चल बसा।
मरने से पहले मैं खुश था — मैंने माँ को उसका पहला बेटा लौटा दिया, पिता को सुधार दिया, और दोनों परिवारों को एक कर दिया।
अब जब मैं आपके दरबार में आया प्रभुजी — आपने मेरी सेवा के लिए पाँच अप्सराएं भेजीं। वे मुझसे प्रेम करती हैं, मेरी सेवा करती हैं, मेरे परिवार का हाल भी लेती रहती हैं।
मगर अब वे आपस में लड़ने लगी हैं।
ईश्वर ने अप्सराओं से पूछा – “क्या देखा तुमने इस महेश में, जो इतना प्रेम करने लगीं?”
पहली बोली – “इनकी वाणी में पवित्रता और सत्य है।”
दूसरी – “तन-मन से स्वच्छ हैं।”
तीसरी – “रिश्तों को निभाने का अद्भुत ज्ञान है।”
चौथी – “धार्मिक भावना और श्रद्धा ने मोहित किया।”
पाँचवीं – “इनकी सुंदरता और मोहिनी सूरत ने बाँध लिया।”
ईश्वर सोच में डूब गए – “एक मानव में इतने गुण!”
ईश्वर ने न्याय किया — सभी अप्सराओं को अलग-अलग सेवाओं में नियुक्त किया और हर रस का आनंद लेने का आशीर्वाद दिया। साथ ही वरदान दिया कि महेश जब चाहे, धरती पर अपने परिवार को देख सके।
इस तरह अप्सराओं के प्रेम की जीत हो गई।
दुख कितना भी गहरा हो, अगर मन पवित्र हो तो स्वर्ग भी झुकता है।
एक व्यक्ति की अच्छाई, पूरे परिवार को जोड़ सकती है।
नशा न केवल शरीर, बल्कि रिश्तों को भी खा जाता है।
धार्मिक आस्था और स्त्री सम्मान, किसी भी आत्मा को दिव्यता तक पहुँचा सकता है।
एक सच्चे बेटे का कर्म ही उसकी पूजा है।

[ • शायर नावेद रज़ा दुर्गवी देश के ख्यातिलब्ध शायर कवि हैं. • छत्तीसगढ़ के दुर्ग से हैं, दुर्गवी की रचनाएं ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ में समय-समय पर प्रकाशित होते रहती है. • संपर्क : 99071 21451 ]
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