- Home
- Chhattisgarh
- संत सत्या और तीन राह भटके युवक – कैलाश बरमेचा जैन
संत सत्या और तीन राह भटके युवक – कैलाश बरमेचा जैन
कभी-कभी जीवन में हम अपनी आदतों, इच्छाओं और लालचों के कारण उस मार्ग से भटक जाते हैं जहाँ से सफलता, शांति और आत्म-सम्मान की राह निकलती है। ऐसी ही एक कहानी है तीन युवकों की — टिल्लू, किशोर और लक्की की — जिन्होंने भोग-विलास में अपना वर्तमान गंवा दिया, लेकिन जब सही समय पर उन्हें एक तपस्वी संत का सान्निध्य मिला, तब उन्होंने अपने भविष्य को सँवारने का निर्णय लिया। यह कहानी सच्चे मार्गदर्शन, आत्म-परिवर्तन और सत्संग की शक्ति की प्रेरक मिसाल है।
दुर्ग शहर की ओर एक तपस्वी संत धीरे-धीरे जंगल से पैदल चलते हुए आ रहे थे। उनका नाम था सत्या चंद्राकर। वे कोई साधारण साधु नहीं थे – वर्षों तक जंगलों में तपस्या कर चुके, रुद्राक्ष की माला धारण किए, केसरिया वस्त्र में लिपटे हुए, गहन शांति उनके चेहरे पर विराजमान थी। वे किसी मोह-माया के बंधन में नहीं थे, लेकिन उनका हृदय करुणा से भरा था।
दुर्ग शहर की सीमा में स्थित कमला मोटर्स के सामने वे भिक्षा माँगने रुके। वहीं पर तीनो युवक नौकरी करते थे – टिल्लू, किशोर और लक्की। ये तीनों गहरे दोस्त थे, परंतु जीवन के रास्ते उन्होंने अपने-अपने नुकसान से सीखे थे।
टिल्लू, जिसे लोग तिलोक नाम से भी जानते थे, घुमक्कड़ी स्वभाव का था। कभी यहाँ, कभी वहाँ — उसने जीवन को मस्ती में जिया लेकिन पैसों की कीमत नहीं समझी। आज वह फूटी कौड़ी को मोहताज था।
किशोर, जो कभी एक होनहार मैकेनिक बन सकता था, शराब के नशे में डूब गया। धीरे-धीरे न केवल उसका पैसा गया बल्कि उसका आत्म-सम्मान भी। अब वह टूटा हुआ, खोया हुआ इंसान था।
लक्की, जो चीडिया मारने और गुटखा का आदी था, पैसों के प्रबंधन में पूरी तरह विफल रहा। वह अक्सर कहता था, “कुछ नहीं बचा, सब उड़ गया…”
ये तीनों जब संत सत्या से मिले, तो उनके जीवन में एक मोड़ आया।
संत ने मुस्कराकर कहा,
“मैं तुम्हारा बीता समय वापस नहीं ला सकता। लेकिन यदि तुम आज ही निर्णय लो कि आगे की ज़िंदगी ईमानदारी, परिश्रम और संयम के मार्ग पर चलानी है — तो मैं तुम्हें मार्ग दिखा सकता हूँ।”
तीनों मित्रों ने सिर झुका दिया।
कुछ तो था इस संत के शब्दों में… मानो कोई प्रकाश था जो अंधेरे कोनों तक पहुँच गया था।
संत सत्या ने उन्हें रोज़ की दिनचर्या, ईमानदारी से कमाई और आत्मविश्वास से भरे जीवन के सूत्र बताए। उन्होंने कहा:
“पैसे से पहले विश्वास कमाओ। काम छोटा हो या बड़ा — मन से करो। और आदतें जो तुम्हें तोड़ रही हैं, उन्हें छोड़ो।”
टिल्लू ने ठान लिया कि अब वह दौड़-भाग कर सरकारी कागजों और ग्राहक सेवा में लगेगा। किशोर ने फिर से मैकेनिक का काम सीखना शुरू किया और अपनी शराब की लत को छोड़ा। लक्की ने आरटीओ और गाड़ी रजिस्ट्रेशन से जुड़े कार्यों में खुद को झोंक दिया।
कमला मोटर्स की किस्मत जैसे बदल गई।
सत्या चंद्राकर को वे तीनों ने ससम्मान अपना गुरु बना लिया। उन्हें कमला मोटर्स में एक सीनियर मैनेजर जैसा स्थान दिया गया। अब वह दुकान सिर्फ गाड़ियों की नहीं, चरित्र निर्माण और अनुशासन का केंद्र बन चुकी थी।
धीरे-धीरे कमला मोटर्स शहर में ईमानदार सेवा, अनुशासित व्यवस्था और विश्वसनीय कार्यशैली के लिए मशहूर हो गई। यह सब संभव हुआ संत सत्या के मार्गदर्शन और तीन दोस्तों के आत्मपरिवर्तन से।
जीवन में भटकाव स्वाभाविक है, लेकिन सद्गुरु का सान्निध्य और आत्म-संकल्प से कोई भी इंसान पुनः उन्नति की राह पकड़ सकता है। अतीत चाहे जितना भी कष्टदायक क्यों न रहा हो, वर्तमान में लिए गए सही निर्णय ही भविष्य को चमका सकते हैं। इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि संयम, साधना और सत्संग ही सच्चे बदलाव की कुंजी हैं।

[ • कैलाश बरमेचा जैन छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर से हैं. साहित्यिक चिंतक कैलाश जी लेखन में निरंतर सक्रिय है. ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)