कविता आसपास : तारकनाथ चौधुरी
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स्वगत [SOLILOQUY]

देवताओं के देश में रहता हूँ,
राक्षसों से लड़ता रहता हूँ
आहत-पराजित होकर
देवालयों पर लोटता हूँ।
चुप रहकर ,चुप रहने वाले
इष्ट से वेदना व्यक्त करता हूँ
बजाता नहीं मैं जो़र -जो़र से घंटियाँ
और न पीटता हूँ ढोल
क्योंकि मैं जानता हूँ
देवता अब अवतरित नहीं होंगे
अणुवत सबके अंतस् में समा गये हैं
विवेक की ज्योति जले तो
अनुभव होता है उनका- आत्म विश्वास में
सहयोगी हाथों में,प्रेम में,करुणा में,
क्षमा में,सृजन में…
इसलिए मैं माँगता कुछ भी नहीं उनसे
बल्कि उसकी स्थिरता से प्रेरित होकर
अपनी अस्थिरता को शांत करता हूँ
और फिर लौट आता हूँ
इस बोध के साथ कि
हार और जीत में,सुख में दुख में
हानि-लाभ की स्धितियों मैं
तटस्थ होकर रहना ही
मानव जीवन की श्रेष्ठता को प्राप्त करना है।
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कभी तो बादल फटता

पहाडी़ सौन्दर्य
समाया था उसकी देहयष्टि में
जो भी देखता
निकट आने को आतुर हो जाता
जैसे उमड़ पड़ते हैं सैलानी
पहाडी़ झरनों में खुद को भिगोने।
प्रेमोन्माद में
देते चले गये उसकी देह में
सैकडों घाव
ठीक पहाडी़ रास्तों की तरह।
काश कि कर पाती कभी वो प्रतिकार
फट पड़ता उसके भीतर का बादल
और मलबे में बदल देता
उन सभी के अस्तित्वों को
जो प्रेम के अकलुष रुप को
बलात् धर्षण से
विकृत किये जा रहे हैं।
• संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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