कवि और कविता : पल्लव चटर्जी
11 months ago
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कुछ भी तो नहीं बदला

कुछ भी नहीं बदला…
मानव के प्रति मानव का आक्रोश
सभ्यता के आँगन की सीमा लाँघकर
सब कुछ युद्ध में परिणत कर दिया
विनाशक प्रक्षेपास्त्रों के आघातों से
बडी़ बडी़ इमारतें,कारखाने,खनिज तेल की कूपें
आग की लपटों में समाने लगी हैं
अगणित असहायों की ह्दय विदारक चीखों से
आसमान बहरा हो गया,इसलिए चुप है
विश्व मानव से शांति का अधिकार
छीनने वाले ताक़तवर पापियों
सृष्टिकर्ता की चुप्पी
तुम्हारे सर्वनाश का संकेत है-
पाप का जीवनकाल अनिश्चित और अल्पकालिक होता है।
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आरोप बेबुनियाद

विश्वास ही धर्म का आधार है
उदारता नहीं ,
गीता का पाठ करना
कोई अंधविश्वास नहीं
यह आरोप बेबुनियाद है।
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• कवि संपर्क-
• 81093 03936
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chhattisgarhaaspaas
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