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इस माह के ग़ज़लकार साजिद अली सतरंगी
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• ग़ज़ल-1

गुज़रे हैं कई शहर से लश्कर मेरे आगे
अपनों ने ही फूंका है मेरा घर मेरे आगे//1
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हक़ में उन्हीं के फैसला मुंसिफ़ ने सुनाया
जो लोग चलाते रहे ख़ंज़र मेरे आगे //2
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तारीख़ मुअय्यन थी मेरी मौत की लेकिन
बदले हैं फरिश्तों ने कलेंडर मेरे आगे //3
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पर्दा-नशी रक्खा था जिसे कल तलक मैंने
अब रोज़ गुज़रता है खुले सर मेरे आगे //4
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दिल में दबाएं रक्खे थे सब राज़ ही उनके
पर आज़ करेंगे वो उजागर मेरे आगे //5
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ये माॅं की दुआओं का असर लग रहा मुझको
चलते हैं फ़रिश्ते जो बराबर मेरे आगे //6
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सब साथ मेरा छोड़ गए मुश्किलों में पर
दुश्मन ही लगाते रहे चक्कर मेरे आगे //7
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गर्दिश में सितारा मेरा जब आ गया साजिद
घर हो गए अपने सभी खंडहर मेरे आगे //8
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• ग़ज़ल-2

हम अगर चाहे तो हालात बदल सकते थे
बर्फ़ से जज़्ब में तूफ़ान निकल सकते थे //1
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लफ़्ज़ कुछ ऐसे थे मतलब ही बदल सकते थे
हम जो चुप ना रहे, मुद्दे भी सँभल सकते थे //2
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इस क़दर उलझे हो अब जज़्ब ए मुहब्बत में तुम
हल अगर ढूंढते तो वो भी निकल सकते थे //3
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तुम हक़ीक़त को न अफ़वाह में ढलने देते
तो कई शहर के हालात सँभल सकते थे //4
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जो सियासत की जगह दिल से निकलते जुमले
तेरे अल्फ़ाज़ तो ऐसे न फिसल सकते थे//5
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वक़्त रहते जो तुम उल्फ़त को सँभाले होते
फिर किसी रोज़ ये मंज़र भी बदल सकते थे //6
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याद करते अगर तुम माॅं को मुसीबत में फिर
तेरी ऑंखों के ये आंसू भी सॅंभल सकते थे //7
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आज़ कुर्सी को जो बैठे हैं सॅंभाले साजिद
तुम अगर चाहते इनको भी बदल सकते थे //8
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• ग़ज़ल-3

आज़ दिन भर यही सोचता रह गया
ज़ीस्त में बाद माॅं के तो क्या रह गया //1
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हर जगह से मिटाने की कोशिश हुई
नाम दिल पर लिखा था लिखा रह गया //2
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जिस ने हर घर को रौशन किया था मगर
शब के जाते वो तन्हां जला रह गया //3
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जो चलें थें मिटाने को दुनिया यहां
नाम मिट्टी में उनका दबा रह गया //4
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मुझको हिस्सों में तक़्सीम कर के मगर
वो किताबों में ख़ुद भी छपा रह गया //5
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दाग़ दामन से लाखों हटाये मगर
दाग़ दामन पे इक बद-नुमा रह गया //6
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माॅं अदम के सफ़र पे रवाना हुई
तिफ़्ल गोदी में इक खेलता रह गया //7
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झूठ बाज़ार में बिक गया हर तरफ़
सच को साजिद मगर बेचता रह गया //8
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[ ▪️ परिचय-
• हापुड़ रोड मेरठ उत्तरप्रदेश के इंजीनियर साजिद अली ‘सतरंगी’ का जन्म 20 जनवरी,1990 को हुआ. • ‘सतरंगी’ साहित्यिक संस्था ‘बज्म ए अफरोज़’ के संस्थापक हैं. • अफरोज़ एजुकेशनल ट्रस्ट एवं एस्पायर आर्किटेक्ट के चेयरमैन हैं. • 700 से अधिक गीत/ग़ज़ल/कविता लिख चुके ‘सतरंगी’ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वक़्त-वक़्त पर छपते रहते हैं. कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों में भी शिरकत करते हैं. • अब तक प्रकाशित पुस्तकें- ‘सदी के मशहूर ग़ज़लकार’/ ‘इंकलाब ए ग़ज़लगोई’/ ‘बचपन’/ ‘स्त्री’/’प्रकृति की छांव में’ और ‘फख ए ग़ज़लगोई’. • अनेकों सम्मान से सम्मानित ‘सतरंगी’ के 3 ग़ज़ल पहली बार ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ स्तम्भ ‘इस माह के ग़ज़लकार’ में प्रकाशित कर रहे हैं. – संपादक]
• संपर्क-
• 94575 30339
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