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शिक्षक दिवस पर विशेष स्मृति आधारित लघुकथा ‘आशीर्वादीय धौल’ – तारकनाथ चौधुरी
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आशीर्वादीय धौल
शिक्षक दिवस का पुनीत पर्व।शिक्षण-संस्थाओं में उत्सवी वातावरण और छात्र-छात्राओं में अपने गुरूजनों के सम्मानार्थ रोचक और चौंकाने वाले कार्यक्रमों का आयोजन।ऐसे ही एक आयोजन में एस.डी.एम.साहब मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित थे।रंग-बिरंगे फूलों से सजे मंच पर विशिष्ट अतिथियों की आसंदियाँ अभी रिक्त थीं।किंचित विरति पश्चात् एक छात्र और एक छात्रा सादर अभिवादन करते हुए मंच पर उपस्थित होते हैं और समवेत स्वर में गुरूओं को समर्पित श्लोक का पाठ करते हैं तत्पश्चात् कार्यक्रम की शुरुआत की उद्घोषणा की जाती है।बारी-बारी से अतिथियों को ससम्मान मंचासीन होने का सादर अनुरोध किया जाता है।मुख्य अतिथि के नाम की उद्घोषणा होते ही लयबद्ध करतल ध्वनियाँ उपस्थितों के आनंद का प्रतिनिधित्व करने लगती हैं।किंतु ये क्या एस डी एम साहब मंच की ओर न आकर भीड़ की तरफ क्यों जाने लगे?उँगली तो तब सभी की दाँतो तले आ गई जब सभी ने एस डी एम साहब को एक शीर्णकाय वृद्ध के कदमों पर शीश झुकाते हुए देखा जिन्हें वे अब अपनी बलिष्ठ भुजाओं का सहारा देकर मंच की तरफ ले आ रहे थे।मंच की परिधि पर पहुँचते ही एस डी एम साहब ने कुछ छात्रों को अपने पास बुलाया और वरिष्ठ आदरणीय को मंचारोहण में सहयोग का निर्देश देकर स्वयं द्रुत गति से मंच पर चढ़ गये और संचालन कर रहे छात्र से माइक्रोफोन लेकर लोगों से खडे़ होकर श्रद्धेय के अभिनंदन का आग्रह किया। सबकी दृष्टि का कौतूहल और मानस की परिकल्पना तब सहज होने लगी जब एस डी एम साहब ने गुरुर्ब्रह्मा,गुरुर्विष्णुः का उच्चार करते हुए ये कहा कि आज के इस पावन समारोह के मुख्य अतिथि मैं नहीं बल्कि मेरे परम आदरणीय,मेरे आदर्श गुरु हैं जिनके आशीर्वादीय धौल ने कुम्हार की तरह मेरे जीवन को सँवारा,जिनकी प्रेरणा की. कुम्हार की तरह मेरे जीवन को सँवारा,जिनकी प्रेरणा की ऊर्जा ने मुझे इस योग्य बनाया।

लगभग 25 बरस बाद उनके दर्शन और चरण रज माथ पर धरने का दैवयोग हुआ है।मैं प्रतिदिन विद्यालय पहुँचकर इन्हें प्रणाम करता और ये मेरी पीठ पर जो़र की एक धौल जमाते हुए कहते-“तू ज़रुर एक दिन बडा़ आदमी बनेगा।”मैं चाहूँगा वे मुख्य अतिथि की आसंदी पर विराजित होने से पहले एक बार फिर मेरी पीठ पर प्रबल आशीर्वादीय धौल जमायें जिससे मेरे व्यक्तित्व की मलिनता परिष्कार हो सके और मेरा शेष जीवन लोक कल्याणार्थ समर्पित हो सके।इस भावुक उद्बोधन ने उपस्थित सभी के हृदय को इतना आंदोलित किया कि उनकी तालियों की गड़गडा़हट गगनभेदी हो चली थीं।
“गुरु कुम्हार शिष कुँभ है,गढि गढि काढै़ खोट।
अन्तर हाथ सहार दै,बाहर बाहै चोट।।”
• लेखक संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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