इस माह की कवयित्री : छत्तीसगढ़ दुर्ग की प्रगतिशील विचारों की सुपरिचित कवयित्री विद्या गुप्ता
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छोटा सा सवाल
दो और दो…???

छोटा सा सवाल,
दो और दो…..????
एक से नौ तक है
सीढ़ियां…..
जीरो लगाते हुए आकाश तक
करना है विस्तार
बगैर किसी के जीरो को काटे
अपने-अपने अनुसार
दो और दो,
बराबर चार…..!!
बेटा पढ़ता रहा
पिता भूल गया कि,
तू…. और …..मैं
हम ही तो होंगे ना…..!!
जाने कब
दो और दो पांच हो गया
बदल गए सारे समीकरण
उलझ गए तार तार
यह…..!!
विश्वयुद्ध होने के
गणित की
पहली गलती है.
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निर्माण के कैनवास पर…

बचपन के पथ को
मत दो, अपने धुंधलके
अन्वेषक मन को मत दो….
लीक के अंधेरे …..
हां बच्चों के जिज्ञासु मन में कुछ प्रश्नों को उठने दो , उसके अंदर जिज्ञासाओं को पनपने दो,….. बादलों में पानी कहां से आता है ?…… दिन में सितारे क्यों नहीं दिखते ?…… पेड़ के पत्ते क्यों सूखते हैं ? परछाई क्यों बनती है ? अंधेरे में डर क्यों लगता है ?….
उसके संशय को
और गहराने दो…..!!
टूटेंगे एक दिन
अंधेरे आच्छादन
वह खोज लाएगा जुगनू सी रोशनी
खोलेगा स्वयं अपनी गांठें…..!!
जिज्ञासाएं
देती हैं आमंत्रण ….!!
प्रश्न खोजेंगे हल
घूमती है धरती,
या घूमता है सूरज..??
उसका कॉपरनिकस
स्वयं खोजेगा हल …..
यद्यपि यह सच है कि हर पिता अपने बच्चे का मार्गदर्शक होता है, अपने अनुभव से उसका पथ निर्देश करता है मगर बगैर जिज्ञासा के थोपा हुआ उत्तर भी बच्चों के मार्ग को अवरुद्ध करता है। उसे खोजने दो, प्रश्नों से परेशान होने दो …. जिस दिन वह स्वयं अपने प्रश्न का का हल खोजेगा…..!!
वह रुकेगा नहीं,
चढ़ाकर
तुम्हारी श्रद्धा पर अक्षत चंदन
उसे तलाशने दो
अपनी पूजा का पात्र,
उसे बुद्ध नहीं
बोध पाने दो
स्वयं में बोधिसत्व होने दो.
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क्या आप अपने साथ हो…???

क्या आप अपने साथ हो…..???
आप कह पा रहे हो,
जो कहना चाहते हो……!!
आपके होठों पर टंका बयान
आपकी आंखों के बयान से
बिल्कुल अलग है,.. क्यों ??
क्या डर रहे हो….??
लेकिन यह सवाल भी व्यर्थ या झूठ है
क्योंकि झिझक के झीने पर्दे
बता रहे हैं कि,
हां सच के उस पार
होठों को गलत पढ़ाया गया है पाठ
कटीली हंसी
कह रही थी हंस दो….!!
मत रोको धार को
होने दो होठों को और टेढ़ा
और कटीला….!!
मगर तभी
फटी पतंग से फड़फड़ाते डर ने
होठों पर चिपका दी
चिकनी लाई
होंठ हंस पड़े
सलाम सलाम कहते हुए.
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• संपर्क-
• 96170 01222
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chhattisgarhaaspaas
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