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पितृमोक्ष अमावस्या पर विशेष : श्रद्धा-धर्म, पितृ-मोक्ष अमावस्या [महालया] प्रसंग : आज पितरों को सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है – श्रीमती भावना संजीव ठाकुर [छत्तीसगढ़-रायपुर]
महालया सनातन धर्म की पावन पवित्र संस्कृति और संस्कार हैं।जब पूरे एक पक्ष तक हमारे पितरों का पूर्ण श्रद्धा के साथ तर्पण होता है और अमावस्या के दिन सुबह पुनः उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ विदाई दी जाती है । यह पितृ मोक्ष अमावस्या का दिन होता है जिस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात , बिसरा दिये गए अथवा जिनका वंश समाप्त हो गया हो उन सभी पितरों को सम्मान पूर्वक विदाई दी जाती है।

हिंदू पंचांग में अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन भाद्रपद मास की अमावस्या को आता है और इसे पितृपक्ष का अंतिम दिन माना जाता है।इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है क्योंकि जिन लोगों ने श्राद्ध पक्ष में अपने पूर्वजों का तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध नहीं कर पाया हो, वे इस दिन सामूहिक रूप से सभी पितरों के लिए विधि-विधान से श्राद्ध कर सकते हैं।इस दिन किए गए तर्पण और पिंडदान से पितरों को विशेष तृप्ति मिलती है और उनकी आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।मान्यता है कि पितर इस दिन अपने वंशजों का आशीर्वाद देकर उनकी संतानों की रक्षा और समृद्धि करते हैं।
स्नान-दान : प्रातःकाल नदी, तालाब या पवित्र जलाशय में स्नान कर तिल और जल से तर्पण किया जाता है।
पिंडदान

पितरों के लिए चावल, जौ, तिल आदि से पिंड अर्पित किया जाता है।श्राद्ध भोज : ब्राह्मण या जरूरतमंद लोगों को भोजन और दान देना पुण्यकारी माना गया है।
गाय, कुत्ते, कौए, चींटी आदि जीवों को अन्नदान करना भी आवश्यक माना जाता है क्योंकि इन्हें पितरों का स्वरूप समझा जाता है।
इस दिन गया, वाराणसी, प्रयागराज, उज्जैन, गंगा तट आदि तीर्थस्थलों पर पिंडदान और तर्पण का विशेष महत्व है।
इसे पितृमोक्ष अमावस्या इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह पितरों की आत्मा को शांति और मुक्ति प्रदान करने का अंतिम अवसर होता है।
पितृ मोक्ष अमावस्या केवल धार्मिक अनुष्ठान का दिन नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और श्रद्धा प्रकट करने का अवसर है
जब तक मनुष्य में जीवन का अंश होता है पितृ उस आत्मा में निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहते हैं ।और जब वे पित्र के रुप में सम्मान पूर्वक पूजे जाते हैं तब वे अपनी संतती को सुख,सौभाग्य, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देकर जाते हैं।
अश्विन अमावस्या पित्र मोक्ष अमावस्या या महालया कहलाती है।
एक ओर पितृ पृथ्वी लोक से मृत्यु लोक की ओर जाते हैं वहीं दूसरी ओर
मां जगत जननी कैलाश पर्वत से पृथ्वी लोक में आती हैं।जाते हुए पितृ और आ रही जगत माता दोनों ही मनुष्य संतती को सौभाग्य का परम आशीर्वाद देते हैं और यही सौभाग्य दायिनी अमावस्या महालया कहलाती है ।
महिषासुर ने जब देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें अपने आधीन कर लिया था उसे पूर्व से एक वरदान था कि वह देवता,असुर अथवा किसी पुरूष द्वारा नहीं मारा जा सकता,ऐसे में सभी देवताओं द्वारा उत्पन्न शक्ति से माता जगदम्बा दुर्गा की उत्पत्ति हुई।महालया से माता दुर्गा और महिषासुर का संग्राम शुरु हुआ जो दस दिन तक चला ,अंत में महिषासुर का माता ने मर्दन कर देवता सहित पूरे जग को भय मुक्त कर सौभाग्य प्रदान किया।
वैसे तो मूर्ति कार माता की मूर्ति कई माह पहले से बनाना शुरु करते हैं । इन मूर्तियों में खूबसूरत रंग परिधान,चमचमाते जेवर से अलंकृत माता की मूर्ति शेर पर सवार रहती है और महिषासुर का मर्दन भी कर रही हैं आठ भुजाएं अपने बच्चों पर कृपा बरसा रही हैं,पर आंखें बंद होती हैं ऐसा माता की संपूर्ण मूर्ति को बनाया जाता है किंतु अभी तक मां ने आंख नहीं खुली होती है।
आज महालया के दिन मूर्तिकार अपनी पूरी साधना,तपस्या और भावना के साथ माता की आंखों मे रंग भरते हैं,फिर माता जी की स्थापना होगी। जन मन में उनकी आंखों से जहां दानव के लिए आग बरसेगी वहीं पर माता अपने बच्चों पर करुणा और दया बरसाएंगी ऐसी मानता मानी जाती है ।

यही पवित्र ‘महालया’ के रूप में स्थापित एवं मानी गई है. अति-शुभ नवरात्रि.
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chhattisgarhaaspaas
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