‘आरंभ’ श्रृंखला-2 : डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय

[ • प्रगतिशील एवं जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’. साहित्य का कोई अंत नहीं होता,अंत ही प्रारंभ है और इसी उद्देश्य को लेकर हमने गठित किया है ‘आरंभ’. • ‘आरंभ’ की इस यात्रा की पहली कड़ी में देश की चर्चित शायरा नूरुस्सबाह खान ‘सबा’ की ग़ज़लों से प्रारंभ हुई थीं ‘आरंभ’. • ‘आरंभ’ की दूसरी कड़ी में केंद्रीय विद्यालय [सरायपाली-छत्तीसगढ़] में पदस्थ,प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय की कविताओं को पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएं – संयोजक ‘आरंभ’]
▪️
मन और पर

मेरा मन करता है
सहला आता हूं
गेंदे के गुदगुदे गाल
बटोर लाता हूं
एक अंजुरी ओस में भीगे
सेफालिका का फूल
सिरहाने रख मोंगरा
लेट जाता हूं
रोमिल लान पर।
हे गैरैया!
तुम मेरे घर आती हो
फुर्र से
डाल की फुनकगी पर पहुंच जाती हो
चिचियाते चूजों को
दाना खिला आती हो
एक बात बताओ
ये सब मन से करती हो
या पर से?
क्या तुम्हारे पास
उड़ने की दो शक्तियां हैं
बताना चुपके से।
▪️
चुपचाप

मैंने कभी नहीं खोला दरवाज़ा
उसने भी नहीं खटखटाया
आ जाता है
सुबह के अखबार की तरह
दरवाज़े के नीचे से
पसर जाता है
कोने-कोने में
वाई फाई की पहुंच की तरह।
मुझे मालूम था
दुःख आएगा
मैंने खोल रखा है
एक रोशनदान
उषा आती है सुबह
रात में चांदनी
तेज हवाओं का झोंका
रिमझिम फुहार की बूंदें
मौसम में कभी-कभी
तिनका दबाए
आती है गौरैय्या
मैं भी इसी रास्ते से
निकल जाता हूं बाहर।
▪️
सोखता

बचपन में था
नायाब सोखता
पेन पोंकती तो
पी लेता कागज़ का दर्द।
सोखता
पता नहीं कब बन गया
एक मुठ्ठी रेत
जिसे उठा
रख लिया बहुत अंदर
अब सोख लेता
सारे दुःख,आलोचना
ऊपर से भुरभुरा
अंत: में संभाले नमी ।
जब कोई
लटका चेहरा
थके पांव
आता है पास
अपनी पूंजी में से
दें देता हूं एक मुट्ठी रेत।
▪️
मन, दूध और बादल

मन
दूध और बादल
इनका फटना
बस पानी-पानी होना है
फटना माने
मूल स्थिति से नीचे खिसकना।
पानी फटता होगा तो
क्या होता होगा?
नहीं-नहीं
जीवन को यह सुबीता कहां।
जिसकी मौजूदगी
अनिवार्य हो
प्रतिशत में
फट कैसे सकता है?
नहीं पानी तपता है
तपी हुई चीज
नीचे नहीं गिरती
पानी हो या मनुष्य
ऊपर ही उठते हैं।
▪️
जीवन

बीज
निर्बंध होता है
स्व-से तो
छतनार होता है
जीवन के लिए।
आंसू
कोटर -बंधन से
मुक्त होते हैं तो
सुख-दुख के रूप में
परिभाषित करते हैं
संवेदनाओं को
अंतस की।
विचार
पूर्वाग्रह से
मुक्त होकर
वेदों में रूपांतरित हो
सूरज बनते हैं
वसुधा के लिए।
मुक्ति
एक उत्सव है
जड़-जंगम और चेतन का।
गर्भनाल से विच्छेदन पर
गूंज उठती हैं
किलकारियां
जीवन के प्रांगण में।
•••
• डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय
________
•एमए [हिंदी], बीएड, पीएचडी की शिक्षा के बाद वर्तमान में केंद्रीय विद्यालय में पदस्थ हैं.
• प्रकाशित कृति-
‘रेज़ाणी’ और ‘अपना-अपना चाँद’ [कविता संग्रह]/ ‘कम्मो’ [उपान्यास]/’एक था ढ़ेला एक था पत्ता’ और ‘सात समंदर की मसि करों’ [आत्मकथात्मक संस्मरण]
• सम्मान-
केंद्रीय विद्यालय संगठन का राष्ट्रीय प्रोत्साहन पुरुस्कार/बीआर अंबेडकर राष्ट्रीय सम्मान.
• शासकीय कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए निरंतर अध्ययन एवं लेखन में सक्रिय हैं डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय.
* संपर्क-
* 98265 61819
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)