विशेष अवसर पर विशेष कविता : अमृता मिश्रा
1 year ago
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दशहरे की रात
– अमृता मिश्रा
[ अध्यापिका, दिल्ली पब्लिक स्कूल, भिलाई-छत्तीसगढ़ ]

आज रात फिर रावण जला!
हर- घर हर मन हर्षोल्लास पला।
हर साल की तरह इस बार भी,
राम की जीत का डंका बजा।
हुई असत्य पर सत्य की विजय,
नराधम को मिली सज़ा।
लेकिन इन जयघोषों के बीच में,
फिर कैसे रक्षित होगी सीता ???
कैसे बचेगी लाज जगत में,
कैसे भयमुक्त हो हर सुता?
आज भी न जाने क्यों सहमी-सहमी सी है देश की सिया!
अभी भी ?
ये तो यक्ष प्रश्न है फिर,
राम के मुखौटे धारण किये, सुसज्जित उनके वेश में कई, रामरूपी बहरूपिया रावण
अब भी घर-घर में है जीता।
किंचित इसी सोच में डूबी है वो,
इसीलिए तो जलते रावण को देखकर भी…
मंथन में है गुमसुम जनकसुता…
बहरूपिए राम-रावण से कैसे बचें?
ये सोच भयभीत-सी है, घर-घर में सीता।
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chhattisgarhaaspaas
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