छठ पूजा पर्व पर विशेष : भावना संजीव ठाकुर
▪️
छठ पूजा-सूर्य, सत्य और संयम का महापर्व
– भावना संजीव ठाकुर
[ रायपुर-छत्तीसगढ़ ]

भारतीय संस्कृति के असंख्य पर्वों में छठ पूजा अपनी अद्भुत शुचिता, गहन अनुशासन और अप्रतिम आध्यात्मिकता के कारण विशिष्ट स्थान रखती है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच पवित्र संवाद है।जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश पाँचों तत्वों के प्रति कृतज्ञता का महाउत्सव। इसीलिए इसे सूर्योपासना का महापर्व और सत्य-संयम की साधना*ल कहा गया है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व चार दिनों तक चलता है नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य।इस दिन व्रती सूर्योदय के बाद किसी नदी, सरोवर या जलाशय में स्नान कर शुद्धता का संकल्प लेता है। घर में निर्मलता का वास होता है, और सादा, सात्त्विक भोजन ग्रहण किया जाता है जिसमें न तो प्याज-लहसुन होता है, न किसी प्रकार का विकार। यह दिन शरीर की नहीं, आत्मा की सफाई का प्रतीक है।
पूरा दिन निराहार रहकर व्रती आत्मसंयम की चरम परीक्षा से गुजरता है। सायंकाल चाँद निकलने पर गुड़-खीर और रोटी का प्रसाद बनता है। उसी प्रसाद से व्रती अगला व्रत आरंभ करता है। यह तपस्विनी भावना का उत्सव है।भूख को भक्ति में रूपांतरित करने की साधना।
संध्या समय नदी या तालाब के तट पर व्रती महिलाएँ अथवा पुरुष दीप-सोप (डाला) लेकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। सूर्य की किरणों में पड़ती जल-तरंगें मानो व्रती के मन की तरंगों से संवाद करती हैं। यह अर्घ्य सूर्य से निवेदन है जो ढलता है, वही फिर उगता है।भोर के समय उदित सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन होता है। यह क्षण केवल पूजा नहीं, पुनर्जन्म का प्रतीक है — जैसे नया दिन, नया प्रकाश, नया जीवन।छठ पूजा की जड़ें वेदकालीन सूर्योपासना में हैं। ऋग्वेद में सूर्य को जीवन और चेतना का स्रोत कहा गया है। सबसे प्राचीन कथा के अनुसार, देवमाता अदिति ने षष्ठी देवी की कठोर आराधना कर सूर्य पुत्र आदित्य की प्राप्ति की। अदिति का यह तप ही प्रथम छठ व्रत माना गया। यही कारण है कि सूर्यदेव और षष्ठी माता का संयुक्त पूजन इस पर्व का आधार है। दूसरी कथा राजा प्रियव्रत की है, जिनकी पत्नी मालिनी संतानहीन थीं। जब पुत्र मृतजन्मा हुआ, तब राजा ने आत्मदाह का संकल्प लिया। तभी आकाश से षष्ठी देवी प्रकट हुईं और उनके स्पर्श से मृत शिशु जीवित हो उठा। उस क्षण राजा ने व्रत का विधान बनाया और उसी तिथि कार्तिक शुक्ल षष्ठी से यह पूजा प्रारंभ हुई। यह कथा केवल चमत्कार की नहीं, आस्था और जीवन के पुनर्जागरण की प्रतीक है।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने छह अंशों में विभाजन किया था। इनका छठा अंश ही मातृ देवी षष्ठी बाल-संरक्षण की अधिष्ठात्री। इन्हें ब्रह्मा की मानसपुत्री देवसेना भी कहा गया, जिनका विवाह बाद में भगवान कार्तिकेय से हुआ। लोकविश्वास में यही देवसेना आगे चलकर छठ माई या छठ माता कहलाईं। इनकी आराधना से संतान को दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
महाभारतकालीन प्रसंग के अनुसार जब पांडव जुए में सब कुछ हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से पांडवों की पुनः राज्य प्राप्ति हुई। यह कथा बताती है कि सत्य और संयम से कठिन से कठिन परिस्थिति को भी पलटा जा सकता है।
बिहार, झारखण्ड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, सामाजिक उत्सव भी है। नदी के किनारे हजारों दीपों की पंक्तियाँ जल उठती हैं-
लोकगीत गूंजते हैं केलवा जईबो रे सुगवा धनिया से।
यह दृश्य श्रद्धा, लोक-संस्कृति और सौहार्द का संगम है। छठ पूजा हमें पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देती है। मिट्टी के दीए, बांस की टोकरी, मौसमी फल, और शुद्ध जल यह सब प्रकृति-सम्मान का रूप है। व्रती स्वयं को प्रकृति की लय में मिलाते हैं, जैसे नदी में सूर्य का प्रतिबिंब शांत, गहरा, उज्ज्वल।
छठ व्रत का मूल तत्व है सत्य, श्रद्धा और संयम। इसमें दिखावा नहीं, भक्ति है, प्रदर्शन नहीं, अनुशासन है। यह व्रत तप की तरह कठोर और ध्यान की तरह निर्मल है। व्रती के लिए प्रत्येक कार्य पूजा का अंग बन जाता है जल ढोना, दीप सजाना, प्रसाद बनाना। छठ का संदेश यही है कि जब मन, वचन और कर्म एक दिशा में प्रवाहित होते हैं, तब जीवन स्वयं पूजा बन जाता है।
छठ पूजा केवल अर्घ्य नहीं आभार का प्रतीक है, यह बताती है कि जीवन सूर्य की तरह ढलता भी है, पर पुनः उगता भी है। छठ माता की पूजा में निहित है ।विश्वास का दर्शन, अनुशासन का विज्ञान और आस्था की पर्यावरणीय चेतना। इस महापर्व का प्रत्येक क्षण हमें याद दिलाता है — “जहाँ सूर्य है, वहाँ जीवन है; जहाँ संयम है, वहाँ सत्य है और जहाँ श्रद्धा है, वहीं छठ मइया की कृपा है।”
जय छठी मइया, सूर्य देवाय नम।
• संपर्क-
• 90094 15415
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)