विशेष अवसर पर कविता- दोहा : ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर
▪️
तुलसी विवाह इक्कीसा
– ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर
[ भिलाई-छत्तीसगढ़ ]

समय पुराने एक में, था जालन्धर क्रूर।
शक्ति वान था अति जिसे, रहा हराना दूर।१।
अति बलशाली वो बना,पाकर के जो साथ,
पत्नी वृंदा का रहा, उसके पीछे हाथ।२।
उसके उपद्रव से सभी, थे देव परेशान।
तभी विष्णु से मिल सभी,निकाले समाधान।३।
जालन्धर को मारने, नीति बनाए स्पष्ट।
वृंदा शील- सतीत्व को,करें विष्णु जी भ्रष्ट।४।
धारण ऋषि का रूप ले,स्वयं विष्णु भगवान।
मायावी वो दैत्य दो, रखे साथ बलवान।५।
देख दानवों को डरी, हो वृंदा भयभीत।
विष्णु भस्म कर के उन्हें, लिए विश्वास जीत।६।
वृंदा ने पूछा तभी, जालन्धर का हाल।
विष्णु चतुराई से यहाँ,चले कुटिल इक चाल।७।
करने शिव से युद्ध हैं, गये हुए कैलास।
वापस आने का यहाँ, रहा नहीं अब आस।८।
शीश हाथ था एक के, धड़ दूसर के हाथ।
मूर्छित वृंदा देख के, हुई पीट कर माथ।९।
माया से प्रभु विष्णु ने, शीघ्र निकाला तोड़।
वृंदा विनती से दिये, सिर धड़ को वो जोड़।१०।
हँसी-खुशी दोनों हुए, नजदीक अंतरंग।
वृंदा के तभी सतीत्व को, विष्णु ने किया भंग।११।
वृंदा ज्यों करने लगी, पत्नी सा व्यवहार।
जालन्धर तब युद्ध में, गया उधर ओ हार।१२।
हरिनारायण छल कपट, हुआ ज्ञात जिस छीन।
वहीं क्रुद्ध हो श्राप दी , हों शिला हृदयहीन।१३।
सिल होकर भगवान ने, बदल लिए जो नाम।
सती श्राप से बन गये, पत्थर शालिगराम।१४।
खेल-खिलाड़ी विश्व का, छलिया था अभियुक्त।
देवों की सुन प्रार्थना, करी श्राप से मुक्त।१५।
तत्काल स्वयं कर गयीं, आत्मदाह संघात।
भस्म हुई स्थल से जहॉं, तुलसी की संजात।१६।
तुलसी जीवित अद्यतन, जहॉं उगी वह धाम।
वृंदा चरणों बैठते, पत्थर सालिगराम।१७।
तुम तो तुलसी रूप में, सदा रहोगे पास।
बॅंधन विवाह बॉंध यह, विष्णु दिए विश्वास।१८।
विवाह तुलसी से किये, रखने अपनी बात।
रख कर साक्षी अग्नि को, फेरा मारे सात।१९।
सुन्दर मंडप है सजी, गन्ने की चॅंहु ओर।
केशव श्यामल चंद्रमा, तुलसी भई चकोर।२०।
बीत गया हरि का शयन, चार माह दिन रात।
कार्य मांगलिक अब सभी,कीजिए शुरूआत।२१।
कैलास : यह..
संघात : वध
संजात : उत्पति
•••
• संपर्क-
• 94792 70283
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)