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कृति और कृतिकार : यथार्थ जीवन [कविता संग्रह] – त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’

त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’ मेरे आत्मीय मित्र हैं. बीते दिनों हमने एक साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की नींव रखी. 15 साहित्यिक मित्रों ने मिलकर ‘आरंभ’ का गठन किया. ‘अंबर’ जी भी उनमें से एक हैं. उन्होंने अपनी नई कृति कविता संग्रह ‘यथार्थ जीवन’ भेंट की. मैंने किताब को पढ़ा. संग्रह के बारे में कुछ लिखूँ, इसलिए एक-एक कविता को पढ़ा. मैं कोई आलोचक या समालोचक नहीं हूँ. मगर ‘अंबर’ जी ने सम्मान के साथ किताब दी तो जो भी लिख सका, लिख दिया.

👉 [बाएँ से] • दीप्ति श्रीवास्तव, त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, प्रदीप भट्टाचार्य, कैलाश जैन बरमेचा, शानू मोहनन और अनिता करडेकर
[सभी ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य]
त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’ की यह 19वीं किताब है. इस कविता संग्रह में उनकी 111 कविताएं हैं. कवि हृदय ‘अंबर’ सरल स्वभाव के हैं. इनकी सबसे अच्छी बात है वे प्रतिदिन सुबह अपनी बात को कविता में लिख देते हैं. ‘यथार्थ जीवन’ में अपनी बात में उन्होंने लिखा कि “मेरी कविताएं जीवन के इर्द-गिर्द घूमती हैं. मैंने जीवन की बारीक सी बारीक बातों का अवलोकन करते हुए, विभिन्न परिस्थितियों का अध्ययन करते हुए कविताओं का सृजन किया है”
इनकी कविता में घर, परिवार, पड़ोस से लेकर देश परदेश बसा हुआ है या यूँ कहें कि यही जीवन का यथार्थ है. ‘अंबर’ की कविताओं में समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचनाशीलता दिखती है. यह जीवन, वास्तव है जो यथार्थवादी बनकर उनके भाषा-शिल्प के साथ कविता बन जाती है.
कवि, गीतकार, उपन्यासकार, कथाकार, विचारक, बाल साहित्यकार त्रयम्बक राव साटकर भिलाई इस्पात संयंत्र से 2015 में वरिष्ठ प्रबंधक [वित्त विभाग] से सेवानिवृत्त हुए हैं. भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा संचालित साहित्यिक संस्था ‘लिट् टरी क्लब’ के अध्यक्ष भी रहे. हिंदी विद्यारत्न भारती सम्मान, धरती पुत्र सम्मान, अभिव्यक्ति सम्मान, लेखक सम्मान, भारत गौरव सम्मान, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम एवार्ड सम्मान से सम्मानित ‘अंबर’ ने एक विशेष रिकॉर्ड बनाया भी बनाया है – वर्ल्ड रिकॉर्ड [जनवरी-2025] e-book received. तीन कविताएं ‘धरा का प्यार’, ‘अभी स्फुर्ति है पैरों में’, ‘लेखन के कर्णधार’ और तीन लघु कथाएं ‘लहरों की हड़ताल’, ‘मिट्टी का घड़ा’ व ‘हिम्मत की पोटली’ वर्ल्ड रिकॉर्ड की एन्थोलॉजी बुक ‘द मेगा मेनुस्क्रिप्ट’ by True Dreamster में छप गई है. इसे तीन वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान प्राप्त हुआ है – India Book of Records/Worldwide Book of Records/Book of World Records. ‘अंबर’ की धर्मपत्नी संध्या साटकर कुशल गृहिणी के साथ-साथ संयुक्त महिला मंडल की सदस्या एवं कला व साहित्य में रुचि रखती हैं. ‘अंबर’ ने किताब में आभार व्यक्त करते हुए लिखा कि मेरी धर्मपत्नी जीवनपथ पर हर कदम में साथ दे रही है, संध्या साहस की अदम्य मूर्ति हैं, जिनकी प्रेरणा से मैं लेखनी को तराशने में सफल हो पा रहा हूँ.
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111 कविताओं की यह किताब से मैं कुछ कविताएं ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं…
▪️ मन से पूछो
हमने मन से पूछा/तुम कब तक मेरे साथ रहोगे/मन ने मुस्कुराते हुए कहा/जब तक तुम्हारा जीवन रहेगा/हमने कहा/परंतु तुम तो ठहरते ही नहीं/लगातार चलायमान ही रहते हो/भई, कभी तो ठहर जाया करो/मन ने फिर कहा/यदि मैं ठहर गया/तो तुम भी ठहर जाओगे/बिना मेरे तुम/बिल्कुल जी नहीं पाओगे/मुझे चलते रहने दो/इसी में तुम्हारी भलाई है/मैं तो तुम्हारे अंदर हूँ/मुझे अंदर ही रहने दो/यही जीवन की सच्चाई है.
▪️ अपना जख्म
सोचा था अपना जख्म भी/अब हम खोलकर रख दें/परंतु लोग सतही तौर पर/हल्के में परखने लगे हैं/सोचा था शब्दों में पीड़ा अपनी/उंडेलकर हम रख दें/परंतु अब तो लोग पीड़ा पर भी/नमक छिड़कने में लगे हैं/सोचा था शब्दों से खेलकर कुछ/सच्चाई उतारकर रख दें/परंतु अब तो सच्चाई को भी/लोग झुठलाने में लगे हैं/सोचा था कलम के सिपाही हैं/कुछ दिशा-निर्देश लिखकर रख दें/परंतु लिखें तो लिखें क्या अम्बर/वे गलती तलाशने में लगे हैं.
▪️ अब नहीं रही वो बात
अब नहीं रही, वो बात/जिसे कर सकें आत्मसात/हर गलियों, चौबारों में/कर रहें लोग आत्मघात/पहले तो, मिल जाते थे/कान मरोड़ लेने वाले तात.
अब नहीं रही वो…
दुआ-सलाम करने की/जैसे खत्म हो गई है बात/आँखें चुराकर जाने की/जैसे आम हो गई है बात.
अब नहीं रही वो…
अब तो गली-गली में/कर रहे हैं लोग दंगे-फसाद/मार-मीट और गालियों की/मिलता है हर जगह प्रसाद.
अब नहीं रही वो…
स्वार्थ की, पुड़िया अब/लपेटकर देते हैं सौगात/बिछाकर, बैठे हैं लोग/अपने शतरंज की बिसात.
अब नहीं रही वो…
▪️ मेरा शहर मेरा सफर
अब ऐसा कोई सफर ना होगा,
जहाँ कोई लंबी डगर ना होगी.
अब कोई ऐसा नगर ना होगा,
जहाँ कहीं कोई बसर ना होगी.
जो हो दिल में मेरा शहर होगा,
मेरी गलियां होंगी,मेरा शहर होगा.
सफर में निकल पड़े हैं हम,
पीछे सब छोड़ आये हैं हम.
जाने क्यों ऐसा लगता है,
अब सब छोड़ चलें हम.
सब रहते हुए भी है खाली,
कुछ समझ ना पाए हैं हम.
आँखों की धुंध में सारी,
खुशियाँ छोड़ आए हैं हम.
सदा खुश रहो फूलो-फलो,
दुआ यही दे आये हैं हम.
वो गलियां, वो चौबारा,
दिल में समाया ही रहेगा.
मेरी गलियां होंगी,मेरा शहर होगा.

👉 • साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य [बाएँ से] ‘निर्झरा’ की लेखिका डॉ. रजनी नेलसन, ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा, ‘यथार्थ जीवन’ के कवि त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य और ‘स्वयंसिद्धा’ की संयोजक अध्यक्षा डॉ. सोनाली चक्रवर्ती.

👉 [बाएँ से] कैलाश जैन बरमेचा, त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, प्रदीप भट्टाचार्य, ‘छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के प्रांतीय अध्यक्ष रवि श्रीवास्तव और ‘अंबर’

👉 • प्रगतिशील एवं जन विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के नींवकर्ता : उद्देश्य है- “आरंभ हो अंत न हो-चिंतन कभी कलांत न हो”
[ ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य : कैलाश जैन बरमेचा, डॉ. महेश चंद्र शर्मा, प्रदीप भट्टाचार्य, डॉ. सोनाली चक्रवर्ती, डॉ. रजनी नेलसन, अनिता करडेकर, नुरूस्साबाह खान ‘सबा’, शानू मोहनन, त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, दीप्ति श्रीवास्तव, संध्या श्रीवास्तव, पल्लव चटर्जी, तारकनाथ चौधुरी, ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल, आलोक कुमार चंदा, प्रकाशचंद्र मण्डल और सुबीर रॉय]
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• प्रस्तुति : प्रदीप भट्टाचार्य
[ संपर्क- 94241 16987 ]
• कवि : त्रयम्बक साटकर
[ संपर्क- 94792 67087 ]
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