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संस्मरण : स्मृतियों का उजाला- रजनी दीदी [डॉ. रजनी नेलसन] का आगमन – कैलाश जैन बरमेचा

👉 • दो शख्सियत डॉ. रजनी नेलसन और कैलाश जैन बरमेचा
एक ऐसा स्पर्श, जो जीवनभर महकता रहे…
कुछ मुलाक़ातें केवल मुलाक़ातें नहीं होतीं—
वे आत्मा पर पड़ी ऐसी धूप होती हैं,
जो वर्षों बाद भी दिल में उसी गर्माहट से चमकती रहती है।
ऐसी ही एक सुखद, स्मरणीय, अविस्मरणीय यात्रा है—
मेरी रजनी दीदी की।
🌼 ज्ञान की देवी का सौम्य रूप – सरस्वती की प्रतिमा समान
मैं दीदी को लगभग पच्चीस वर्षों से जानता हूँ।
पूर्व में वे सहायक शिक्षा अधिकारी रहीं—
पर मेरे लिए वह कभी कोई पद नहीं थीं,
बल्कि एक संस्कार, एक प्रेरणा, एक विचारधारा थीं।
उनकी आवाज़ में हमेशा एक ऐसी शांति होती थी
जो मन की थकान को छूकर उसे शांत कर दे।
उनकी उपस्थिति में सदैव ऐसा लगता था
मानो सरस्वती स्वयं मधुर मुस्कान के साथ सामने खड़ी हों।
ज्ञान, शालीनता, विनम्रता और मानवता—
ये शब्द उनके व्यक्तित्व के आगे छोटे पड़ जाते हैं।
🌺 उस दिन हवा क्यों महक रही थी?
उस दिन सुबह से ही घर का वातावरण कुछ बदल-सा गया था।
हवा में जैसे मोगरे और चंदन की कोई अदृश्य खुशबू तैर रही थी।
मन में एक inexplicable सुकून था,
जैसे कोई बहुत अपना व्यक्ति घर आने वाला हो।
और तभी,
गेट से आती हल्की आहट ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया—
“दीदी आ गई हैं…”
ये शब्द मेरे भीतर बिजली की तरह चमक गए।
मैं तेज़ी से बाहर गया।
दीदी सामने थीं—शांत, सौम्य, गरिमामयी।
मैंने उनके चरणों को छूकर प्रणाम किया।
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा—
वह स्पर्श किसी वरदान जैसा लगा।
🍃 घर में कदम रखते ही जैसे वातावरण बदल गया
दीदी जैसे ही अंदर आईं,
घर के कोने-कोने में एक अनोखी पवित्रता फैल गई।
जैसे हवाएं धीमी हो गई हों,
जैसे कमरों में एक अदृश्य सकारात्मक ऊर्जा भर गई हो।
यह केवल मेरा अनुभव नहीं था—
यह मेरे घर की दीवारों ने भी महसूस किया।
उनके बैठते ही घर जैसे
शिक्षा और संस्कार का आश्रम बन गया।
उनकी बातों में मिठास थी,
उनके स्वभाव में सरलता,
और उनकी मुस्कान में अपनापन।
🌿 दो-चार घंटे… जो जीवन का अमूल्य खजाना बन गए
दीदी मेरे घर पर रुकीं।
घर का सादा, प्रेम से बना भोजन किया।
मेरे परिवार के बीच बैठकर
इतनी आत्मीयता से बातें कीं
कि लगा जैसे वर्षों का बिछोह
इन कुछ घंटों में ही मिट गया।
उनकी प्रत्येक बात
मन की गहराइयों को छूती चली गई।
शिक्षा की चर्चा हो या जीवन के अनुभव—
हर शब्द में ज्ञान था,
हर वाक्य में जीवन जीने की कला।
उनकी मौजूदगी में मुझे लगा
कि मैं कहीं खो गया हूँ…
एक अलग ही शांति में…
एक जगह,
जहाँ बस भक्ति, शांति, स्नेह और सौम्यता ही सौंप रही हो।
🌸 दीदी जब तक घर में थीं, घर घर नहीं—मंदिर था
आम दिनों में हमारा घर एक घर होता है,
पर उस दिन वह ध्यानस्थ मंदिर जैसा लगता रहा।
दीदी की उपस्थिति में
घर की हवा तक पावन हो गई थी।
उनकी आवाज़ जैसे घंटियों की मधुर झंकार।
उनकी बातें जैसे प्रभात की ऊषा।
उनका स्नेह ऐसा
जैसे किसी ने आत्मा पर हाथ रखकर कहा हो—
“मैं हूँ… चिंता मत करो।”
🌥️ और फिर… वह क्षण भी आया
कुछ ही देर बाद
समय ने अपनी रफ़्तार दिखाई।
दीदी उठीं, विदा लेने लगीं।
उनके जाते ही एक अजीब-सी खामोशी घर में फैल गई।
जैसे हवा भी ठहर गई हो।
जैसे दीवारें भी उन्हें जाते हुए देख रही हों।
पर उन्होंने अपने साथ कुछ नहीं ले गईं—
बल्कि बहुत कुछ छोड़ गईं:
खुशबू, अपनापन, स्मृतियाँ और आशीर्वाद।
✨ यादें इतनी गहरी कि जीवनभर साथ रहेंगी
उनके जाने के बाद भी
उनकी उपस्थिति कमरे में बनी रही।
उनकी मुस्कान,
उनकी आवाज़,
मेरे सिर पर उनका हाथ—
सब कुछ जैसे यहीं था,
मेरे आसपास।
उनकी कही बातें
आत्मा पर लिख गई हैं।
मेरा जीवन चाहे जिस राह से गुजरे,
उन यादों की रोशनी हमेशा मेरा पथ प्रकाशित करेगी।
🌙 और फिर… मैं चौंककर जाग गया
मेरी नींद खुली।
मैं अपने कमरे में था—
शांत, अंधेरी रात थी।
और एक क्षण में समझ गया—
यह तो सपना था।
दीदी सचमुच नहीं आई थीं…
मैंने उन्हें सपने में देखा था।
दिल थोड़ा टूट-सा गया।
आँखें नम हो गईं।
मन जैसे कुछ पल के लिए ठहर गया।
पर फिर यही महसूस हुआ—
“जिस दीदी की एक कल्पना इतना सुख दे जाए,
सोचो, वह वास्तविकता में कितनी अद्भुत होंगी…”
🌸 सपने की रौशनी से जग उठी मेरी सुबह
मैंने आँखें बंद करके फिर सोचा—
नहीं, यह सपना नहीं था…
यह तो दिल की वह इच्छा थी
जो वर्षों से भीतर दबी थी।
सपना केवल एक माध्यम था,
दीदी मेरे मन से मिलने आई थीं।
और शायद…
यह सपना मेरे जीवन का
सबसे सुंदर सत्य बन गया।

• लेखक, कैलाश जैन बरमेचा
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chhattisgarhaaspaas
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