साहित्यिक स्तम्भ ‘आरंभ’ : कवयित्री डॉ.संध्या श्रीवास्तव
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मुझको उड़ जाने दो

छोड जग की चिंता पीछे
फेंक बेडियांॅ बंधन नीचे।
कैसे उड़ते हैं अमन चैन से
नीलांबर में ऊंॅचे ऊंॅचे।।
ए पंछी मुझको भी तू ऐसे ही उड़ना सिखला दे।
प्रात खुश्ुी से उड़ जाऊ ऊंचे,
शाम ढ़ले तो आऊं नीचे।
धैर्य लगन से काज करूॅ ,
पंख मिले परवाज बनूं मैं।।
घूप कहीं तो छांव कहीं
अंधड हो तुफानी जमीं।
कैसे सहते हो सब मिलके,
संर्घष तपन के झंझा झोंके।
ए पंछी मुझको भी तू ऐसे ही कुछ सिखला दे।।
आज भी होवे न हमसे वंचित
कल भी करना है सुरक्षित।
जीवनचर्या भी रहे प्रबंधित
जोड तिनके बनाऊँ नीड ।।
नाम जाति प्रजाति अनेक
पर रहे न कहीं मन में भेद।
हिलमिल कर सब रहते
मन में लेकर सदा विवेक।
ए पंछी मुझको भी तू,ऐसे ही कुछ बतला दे।।
कैसे करते तुम सब काम
साथ गुनुगनाते मीठा गान।
जैसे जपते हो राम नाम
तीरथ करते चारो धाम।।
ऐसी उडान मुझे भी भरना
जहां सरहद न कोई सीमा।
ऐसे पंख मुझे भी ला दे
संग तेरे है मुझे भी उड़ना।।
ए पंछी मुझको भी तू ऐसे ही उड़ना सिखला दे।
अपने धवल पंख फैला के
भर कर एक विलक्षण उड़ान।
शांति संदेश फैलाउंगी मैं
अपने संग मुझको उड़ जाने दे।।
छोड जग की चिंता पीछे
फेंक बेडियांॅ बंधन नीचे।
कैसे उड़ते हैं अमन चैन से
नीलांबर में ऊंॅचे ऊंॅचे।।
ए पंछी मुझको भी तू ऐसे ही उड़ना सिखला दे।
ऐसे ही उड़ना सिखला दे।
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नन्हीं चिड़िया नन्हीं चिड़िया

तुम एक नन्ही सी चिड़िया
ऊड़ ऊड़ उड़ती नील गगन में।
भूख लगे या प्यास जरा तो
आ जाती हमारे आँगन में।।
तुम चूँ चूँ करती दाना चुंगतीं
चहकतीं आँगन बगियन में।
हम नाचे गाये खेले संग संग
बचपन के उस आँगन में।।
तुम एक नन्ही सी चिड़िया
आ जाती हमारे आँगन में।।
तुमसे ही मचला मन मेरा
ऊड़ ऊड़ उड़ता नील गगन में
प्यार का परिंदा बनने
युवा मन तरसे मन मन में।
तुमसे सुर मिला उमंगित
गीत गाए किशोर मन ने ।
तुम एक नन्ही सी चिड़िया ,
आ जाती हमारे आँगन में।।
कहाँ गयी तुम चिड़िया रानी
मानव विकास के अन्धड़ में
नहीं है अब छाँह कहीं भी
सीमेंट कांक्रीट के जंगल में ।।
तब
चूँ चूँ करती आयी चिड़िया
रोती रोती आँगन में
अवश विवश सहती पीड़ा
तन में मन में जीवन में।।
बोली चूँचूँ करती चिड़िया
मेरी प्रजाति है ख़तरे में
मानव मेरा भक्षण करते
कुछ तो थे पिंजरे में रखते
पर अब तो मोबाइल टावर
के चक्कर में हम सब भूल
रहे हैं राह नीड़ की
नन्हे चूज़े हैं बड़े सदमें में।।
मै एक नन्ही सी चिड़िया
रहती थी वन उपवन में
नहीं रहे वो बाग़ बगीचे
आँगन नहीं हैं शहरों में।
अब जब तक मौत ना आए
मेरे सूने उजड़ें जीवन में
मै चहक भरूँगी यूँ ही
सबके सूने मन में जीवन में।।
मैं एक नन्ही सी चिड़िया ,
ऊड़ ऊड़ उड़ती नील गगन में।
[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक कार्यकारिणी सदस्य डॉ. संध्या श्रीवास्तव निरंतर लेखन में सक्रिय हैं. • जल, जंगल, पर्यावरण आंदोलन पर केंद्रित ‘बरसेंगे आकाश कुसुम’ संध्या जी की महत्वपूर्ण संग्रह है. • संध्या जी मॉरिशस, इंडोनेशिया [बाली], मलेशिया, थाईलैंड और भारत के अनेकों प्रदेशों सहित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों में भागीदारी व काव्य पाठ का संचालन भी किया. • 50 से अधिक नाटकों में संध्या जी की सहभागिता एवं मुख्य भूमिका रही. • मॉरिशस में उत्कृष्ट काव्य पाठ के लिए Pride of India पुरुस्कार से सम्मानित किया गया. • डॉ. संध्या श्रीवास्तव की 2 और काव्य संग्रह प्रकाशित हुई – ‘बिखरे मोती’ एवं ‘मैं इक बेजुबां फूल’.- संपादक ]
• कवयित्री संपर्क-
• 99813 01586
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chhattisgarhaaspaas
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