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अपनी बात : प्रख्यात बाल साहित्यकार कमलेश चंद्राकर की कृति ‘मम्मा मेरी सुनो जरा’ पर मेरी बात – प्रदीप भट्टाचार्य

सहज, सरल, मनप्रिय और आत्मीय कमलेश चंद्राकर से यदा-कदा शहर में होने वाले साहित्यिक आयोजनों में हो जाया करती है. बीते दिनों कमलेश जी की नई बालगीत संग्रह सर्वप्रिय प्रकाशन [दिल्ली] से छपकर आई है. इस कृति का विमोचन 21 दिसम्बर, 2025 को देश के सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार दिविक रमेश [दिल्ली] के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ. कमलेश जी ने विमोचन के पूर्व मुझसे मिलने मेरे निवास में आए और समारोह में उपस्थित होने का आग्रह कर गए, साथ में ‘मम्मा मेरी सुनो जरा’ की प्रति भी उपहार स्वरूप दिए.

👉 ‘मम्मा मेरी सुनो जरा’ का विमोचन दिल्ली से पधारे प्रख्यात बाल साहित्यकार दिविक रमेश ने किया
इस संग्रह में दिवाकर मुक्तिबोध लिखते हैं-
बच्चों के लिए लिखना बड़ों के लिए लिखने से अधिक कठिन है. बाल कविताएँ अथवा बाल कहानियां हर कोई नहीं लिख सकता. तीन-चार साल के बच्चे-बच्चियों के लिए सार्थक लेखन वही व्यक्ति कर सकता है जो उनके मनोवैज्ञानिक को अच्छी तरह समझता हो. कवि कमलेश चंद्राकर की लिखी अब तक की तमाम कविताएँ इस बात की साक्षी है कि उन्हें बड़े होते बच्चों की प्रकृति की गहरी समझ है इसलिए उनकी ये कविताएँ उस झुकझुक गाड़ी की तरह है जो मधुर स्वर के साथ लहराते हुए चलती है तथा छोटे बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी भाती है.
डॉ. परदेशीराम राम ने कृति में लिखा है-
जीनेट विंटरसन ने कहा है कि किताबें और दरवाजे एक ही बात है. आप उन्हें खोलते हैं और दूसरी दुनिया में चले जाते हैं. इस कथन से भला कोई सच्चा पाठक कैसे इंकार कर सकता है. विशेष कर बाल कविताओं की सही किताब को पढ़ते हुए ऐसी ही अनुभूति होती है. कमलेश चंद्राकर छत्तीसगढ़ के ऐसे ही बाल कविताओं के रचनाकार हैं, जिनकी किताबों को खोलने वाला निश्चित रूप दूसरी दुनिया की सैर करने लगता है. कमलेश चंद्राकर ने जिस तन्मयता और जुनून के साथ विगत पाँच वर्षों से बाल साहित्य का लेखन किया है, उससे छत्तीसगढ़ और देश के समीक्षकों का ध्यान उनकी ओर गया है. कमलेश ने अपनी बाल कविताओं के लिए शीर्षकों का चयन ऐसा किया है कि उससे कई दिशा में पहुँचने वाली प्रतिध्वनियां निकलती हैं. बच्चों को अपना परिवेश किस तरह गहराई से प्रभावित करता है इस पर कमलेश ने खूब ध्यान दिया है. निश्चित रूप से कमलेश चंद्राकर ने बाल कविताओं पर अपना समग्र लेखन केंद्रित कर बड़ा काम किया है.
डॉ. सुधीर शर्मा [अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई] कृति के बारे विश्लेषणात्मक आलेख में लिखा है कि-
छत्तीसगढ़ के कमलेश चंद्राकर पिछले तीस-चालीस वर्षों से सतत् बाल साहित्य में सक्रिय हैं. वे नर्सरी गीतों के विशेषज्ञ हैं और आज भी पूरी ऊर्जा के साथ तीव्र गति से लिख रहे हैं. यदि मैं कहूँ कि कमलेश चंद्राकर लिखते नहीं बल्कि गीत गाते-गुनगुनाते हैं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. कमलेश जी के पास बाल मनोविज्ञान को समझने और महसूस करने की रचनात्मक कला है. वे शिल्प, विषय-वस्तु और भाषा के स्तर पर इतने परिपक्व हैं कि उनके बाल गीतों में विविधता के बावजूद मधुरता, संप्रेषणीयता और रोचकता है. वे ध्वन्यात्मक शब्दों का अनुकरण करके संगीतमय संसार रच लेते हैं. अपने आसपास के न केवल पारंपरिक बच्चों बल्कि आज की आधुनिकता में पल रहे बच्चों के परिवेश को भी वे बड़ी संवेदनशीलता से अनुभूत करते हैं. बाल मनोविज्ञान को अनुभूत करना अलग बात है लेकिन उस अनुभूति को तरलता और सहजता के साथ गीतों में उतार लेना एक कला है. इस कला के मास्टर हैं कमलेश चंद्राकर.
कमलेश भाई की इस कृति में प्रकाशित सभी बाल गीतों को मैंने पूरी तन्मयता से पढ़ा. जो गीत मुझे भा गए, वो आप पाठक भी पढ़ें-
[कुछ गीतों को चित्र के साथ प्रकाशित है ताकि पाठक पढ़ने के आनंद में डूब जाए…]




कमलेश चंद्राकर रचित कुछ और गीत-
बड़ा कठिन गणित है पापा/टीचर जी समझाएंगें/मैं खुद जिसे समझ न पाया/आप समझ क्या पाएंगे.
टब में पानी भरा, भरा/देख रहा मैं खड़ा-खड़ा/पानी में दिख रहा हूँ जब/और नहाना करूँ क्यूँ अब.
अकड़म, बकड़म कहाँ चले/बिना बताए सांझ ढले/घर वाले सब खोज रहे/नहीं दिखे तो खूब खले.
पापा सोचे, दादू सोचे/कैसे क्या है करना/सोच रहा मैं करूँ पढ़ाई/मुझे है आगे बढ़ना.
राजा बेटा बोल, बता/नाहक क्यों रोना करता/सबका पैर पड़ाते मुझसे/मेरा कोई ना पड़ता.
इस संग्रह में ऐसे ही कुल-88 गीत हैं. सभी गीतों का आनंद प्राप्त करने के लिए amazon या कवि से संपर्क करें-
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