नव वर्ष आगमन पर विशेष काव्यात्मक प्रस्तुति – अमृता मिश्रा
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एक और वर्ष
– अमृता मिश्रा
[ अध्यापिका, दिल्ली पब्लिक स्कूल, भिलाई, छत्तीसगढ़ ]

टहनियों के कंधों से
उतर आया है
एक और वर्ष का बोझ।
यह सिर्फ़ पत्तों का झड़ना नहीं,
यह समय का थक जाना है।
हवा ने खोल दी हैं
बीते दिनों की परतें,
और जो भी रंग बचे थे
यादों की छाल में,
सब बहा ले गई।
सड़क पर पड़े पत्ते
कूड़ा नहीं हैं,
वे उन सपनों के पन्ने हैं
जिन पर कभी
वसंत ने हस्ताक्षर किए थे।
पतझड़ की खामोशी में
धरती चुपचाप
बीजों को समझा रही है—
रुकना अंत नहीं,
अंकुरण की तैयारी है।
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chhattisgarhaaspaas
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