इस माह के ग़ज़ल और ग़ज़लकार : राकेश गुप्ता ‘रूसिया’ [छत्तीसगढ़-दुर्ग]
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• आँखों में हसीं इक ख्वाव सा पलता रहा…

आंखों में हसीं इक ख़्वाब सा पलता रहा
तमाशा ज़िन्दगी का बारहा चलता रहा
जवानी काम आयेगी तरक्की के लिए
मुल्क उम्मीद पाले बोझ ये सहता रहा
बनाया जा रहा शैतान वो अनजान था
जहां जैसा उसे ढाला गया ढलता रहा
हम आतंक की कड़ियां मिलाते रह गए
नशे का है ये कारोबार जो चलता रहा
दहशत गर्द का चाहे कोई मज़हब नहीं
शक्ल से साफ था किस कोख में पलता रहा
हादसा कैद करने में लगे थे कैमरे
मदद की आस में घायल वहां मरता रहा
बनाया ‘रूसिया’ हकीम क़ातिल बन गया
सवालों में घिरी तालीम को खलता रहा.
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• उसूलों से न सौदा कीजिये…

अपने उसूलों से न सौदा कीजिए
बस सात पुश्तों का ही रोका कीजिए
मन की ना कर पाए यही अफसोस है
बचा है लूटना एक और मौका दीजिए
अहले तो सियासत का यही उसूल है
अव्वल रहनुमा को ही धोखा दीजिए
चर्चा में बने रहने की फितरत सीख लें
चाहे बदनाम हो जाएं अनोखा कीजिए
गांधी की नेहरू की या पाकिस्तान की
निकले बात तो मौके पे चौका दीजिए
ख़िलाफत में उठे आवाज बुलडोजर चले
अदाओं से हिफाजत का भरोसा दीजिए
जिस तरफ हो हवा रुख उधर का कीजिए
‘रूसिया’ ढंग बदलें रंग चोखा कीजिए.
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• अज़ीज़ इतना रखा जाये…

मुसाफिर का इरादा कब कहां बदल जाए
अज़ीज़ इतना रखा जाये दिल संभल जाए
वक्त ए माज़ी से रखना वास्ता उतना यारो
हाथ आया कहीं ये दौर ना निकल जाए
इक मुनासिब वक्त तक है इंतजार लाज़िमी
इतना नहीं दिल धूप में पिघल जाए
बांट दे ज़िन्दगी टुकड़ों में चाहे तू मुझे
जी सकें अपने लिए वक्त भी निकल जाए
है दिल की ये हसरत इक रोज़ संवारा जाए
दुआ करना कि ये मौसम ना बदल जाए
ना मिलेगी इस ज़माने में कहीं ग़म की दवा
यारों में जन्नत ‘रूसिया’ बैठ दिल बहल जाए.
• संपर्क-
• 96178 66722
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chhattisgarhaaspaas
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