- Home
- Chhattisgarh
- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-108’ में समाजसेवी श्रीमती उमा रानी दास, ज्ञानपीठ पुरुस्कार प्राप्त कवि-लेखक विनोद कुमार शुक्ल और जनवादी कवि नासिर अहमद सिकंदर को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि
‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-108’ में समाजसेवी श्रीमती उमा रानी दास, ज्ञानपीठ पुरुस्कार प्राप्त कवि-लेखक विनोद कुमार शुक्ल और जनवादी कवि नासिर अहमद सिकंदर को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि

👉 [बाएँ से] • आलोक कुमार चंदा, प्रदीप भट्टाचार्य, स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, वीरेंद्रनाथ सरकार, कृष्णचंद्र रॉय और गोविंद पाल
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई निवास [इंडियन कॉफी हाउस : 03 जनवरी, 2025]
‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में भिलाई निवास के इंडियन कॉफी हाउस में सम्पन्न हुई, ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-108’ में संस्था के उपसचिव व बांग्ला-हिंदी के चर्चित कवि प्रकाशचंद्र मण्डल की सासुमाँ समाजसेवी श्रीमती उमारानी दास [निधन : 03 जनवरी 2026], छत्तीसगढ़ से देश के शीर्षस्थ साहित्यकार, 59वें ‘ज्ञानपीठ पुरुस्कार’ प्राप्त रायपुर के कवि-लेखक विनोद कुमार शुक्ल [जन्म- 01 जनवरी 1937 : निधन- 23 दिसम्बर 2025] और जिला दुर्ग-भिलाई से ‘जनवादी लेखक संघ’ के स्तम्भ, प्रगतिशील-समकालीन कवि नासिर अहमद सिकंदर [जन्म- 01 जून 1961 : निधन- 29 दिसम्बर 2025] को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई. शोक सभा और विचार-विमर्श की अध्यक्षता बांग्ला लेखिका व कवयित्री स्मृति दत्त ने किया. उपस्थित रहे- संस्था के सलाहकार व कवि गोविंद पाल, बांग्ला साहित्यिक पत्रिका ‘मध्यबलय’ के संपादक दुलाल समाद्दार, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य, बांग्ला के सुप्रसिद्ध कवि पल्लव चटर्जी, कवि वीरेंद्रनाथ सरकार, आलोक कुमार चंदा, कृष्णचंद्र रॉय और एसके भट्टाचार्य. संचालन गोविंद पाल ने किया.

👉 [बाएँ से] • स्मृति दत्त, वीरेंद्रनाथ सरकार, कृष्णचंद्र रॉय और गोविंद पाल

👉 [बाएँ से] • पल्लव चटर्जी, आलोक कुमार चंदा और प्रदीप भट्टाचार्य

👉 [बाएँ से] • दुलाल समाद्दार • वीरेंद्रनाथ सरकार
प्रारंभ में प्रदीप भट्टाचार्य ने विनोद कुमार शुक्ल और नासिर अहमद सिकंदर पर उनके साहित्यिक यात्रा के बारे में कहा कि-

2025 जाते-जाते छत्तीसगढ़ से देश के सुप्रसिद्ध कवि-उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल एवं छोटी-छोटी कविताओं के बड़े कवि व नई कविताओं के ‘सिकंदर’ नासिर अहमद सिकंदर साहित्य जगत को सूना कर चले गए…

▪️
विनोद कुमार शुक्ल-
“मुझे ढूंढो मत/मैं सब लोग हो चुका हूँ/मैं सबके लिए मिल जाने के बाद आखिर में मिलूँगा/या नहीं मिल पाया तो मेरे बदले किसी से मिल लेना…” ये उस कविता की अंतिम पंक्तियां हैं, जो विनोद कुमार शुक्ल ने हाल ही में पढ़ी थी. जब उन्हें उनके निवास पर ‘ज्ञानपीठ पुरुस्कार’ दिया गया था. “जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे/मैं उनसे मिलने/उनके पास चला जाऊंगा/एक उफनती नदी, कभी नहीं आएगी मेरे घर/नदी जैसे लोगों से मिलने/नदी किनारे जाऊंगा/कुछ तैरूँगा और डूब जाऊंगा/पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब, असंख्य पेड़ खेत/कभी नहीं आएंगे मेरे घर/खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने/गांव-गांव, जंगल-गलियां जाऊंगा/जो लगातार काम में लगे हैं/मैं फुर्सत से नहीं/उनसे एक जरूरी काम की तरह मिलता रहूंगा/इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह/सबसे पहली इच्छा रखना चाहूंगा”. 21 नवम्बर, 2025 को विनोद कुमार शुक्ल को हिंदी साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरुस्कार’ से सम्मानित किया गया था. 1971 में पहली कविता संग्रह ‘लगभग जय हिंद’ प्रकाशित हुई. इनकी कुछ प्रसिद्ध संग्रह है- ‘वह आदमी चला गया, नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह’/’सब कुछ होना बचा रहेगा’/’कविता से लंबी कविता’/’आकाश धरती को खटखटाता है’/ ऐसी कृतियाँ हिंदी कविता की दिशा बदलने वाली मील का पत्थर बनी. इनकी चर्चित उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ {1979} पर फिल्म निर्माता मणि कौल ने फिल्म बनाई. यह उपन्यास, हिंदी उपन्यास की भाषा और दृष्टि को नई जमीन देता है. विनोद कुमार शुक्ल की अन्य उपन्यास है- ‘खिलेगा तो देखेंगे’/’दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘एक चुप्पी जगह’. इनकी कुछ कहानियां ‘पेड़ पर कमरा’/’महाविद्यालय’ और ‘घोड़ा और अन्य कहानियां’ उन्हें साहित्य की ऊँचाई में ले गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी जब छत्तीसगढ़ राज्य के 25वें स्थापना दिवस में रायपुर आए थे, उन्होंने शुक्ल जी से बात की तब शुक्ल ने कहा था कि- लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है, मैं जल्द से जल्द घर लौटना चाहता हूँ, मैं लिखना जारी रखना चाहता हूँ
विनोद कुमार शुक्ल को ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’/’मुक्तिबोध फेलोशिप’/’रज़ा पुरस्कार’/’पैन- नाबोकोव पुरस्कार-2023’ और ‘ज्ञानपीठ पुरुस्कार’. शुक्ल जी कभी भी पुरुस्कारों से परिभाषित नहीं हुए. वे पाठक की चुप सहमति और संवेदना से पहचाने जाते रहे.
शत् शत् नमन
▪️
नासिर अहमद सिकंदर-
कई वर्ष पहले नासिर अहमद सिंकदर ने अपने प्रिय कवि केदारनाथ अग्रवाल के नाम से रखे गए सम्मान ‘प्रथम केदारनाथ अग्रवाल सम्मान’ [बांदा उत्तरप्रदेश] से सम्मानित हुए. अपने निरंतर लेखन के लिए ‘सूत्र सम्मान’ [छत्तीसगढ़ से प्रकाशित साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका, संपादक विजय सिंह] भी मिला. नासिर की कविता में दो धाराओं को स्पष्ट देखा जा सकता है. एक अच्छेपन का आग्रह और दूसरा स्त्री की या स्त्री के प्रति कोमल भावनाओं का रेखांकन. कुछ कृतियाँ, जो नासिर को छोटी कविता के बड़े कवि के रूप में स्थापित किया. कृति- जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में/ इस वक्त मेरा कहा/ भूलवश और जानबूझकर/ खोलती है खिड़की और अच्छा आदमी होता है अच्छा. नासिर कविता में जीते थे. जीवन के आखिरी वक्त तक उनकी कविता के प्रति जीवटता बनी रही. “आधी रात/नींद कोसो दूर/कविता मीलों/क्या करूँ/जतन उपाय/नींद नहीं तो/कविता आए.” “कविता में न आए/बात कोई विचित्र/जीवन का बन जाए बस/जीता-जागता चित्र”. “न आलोचक की जरूरत/न बिंबों की फिक्र/सीधी सच्ची बात का/बस हो जाए जिक्र”. “कहर है/बला है/आप कहते हैं/कविता कला है”
शत् शत् नमन
बंगीय सदस्यों ने 2 मिनट की मौन श्रद्धांजलि अर्पित की.
▪️
‘बंगीय साहित्य संस्था’ ने अपनी-अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया- • एसके भट्टाचार्य ने ‘प्रत्याशा ऑखोने बेचे आछे…’/ • पल्लव चटर्जी ने छोटी-छोटी कविता ‘पुलिस’ एवं ‘तोमार कॉथा मोने पोरे’ से गंभीर बात कही. इनकी इस कविता में परिवर्तनकामी और जीवनधर्मी पक्षधर दिखता है./ • आलोक कुमार चंदा ने मील जामील की रचना ‘कल्पना छुए दी तोमार दिन…’/ • वीरेंद्रनाथ सरकार ने ‘नव वर्ष’ एवं ‘आकाश उड़ा पाखी’/ • दुलाल समाद्दार ने ‘आमाके मोने रखो…’ एवं ‘आमार भालो बासार वर्णमाला’/ • गोविंद पाल ने ‘दाई-कारा’ [जिम्मेदार कौन?], ‘ऋतु परिवर्तन’ एवं ‘सोपनेर देश टा’/ • स्मृति दत्त ने नूतन वर्ष की अभिव्यक्ति को अपनी कविता ‘केटे गेलो बोछोर फेर…में बताई. • प्रदीप भट्टाचार्य ने विनोद कुमार शुक्ल द्वारा रचित अंतिम कविता का पाठ किया- “कोई अधूरा पूरा नहीं होता/और एक नया शुरू होकर/नया अधूरा छूट जाता/शुरू से इतने सारे/कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते/परंतु इस असमाप्त/अधूरे से भरे जीवन को/पूरा माना जाए, अधूरा नहीं/कि जीवन को भरपूर जिया गया/इस भरपूर जीवन में/मृत्यु के ठीक पहली थी मैं/एक नई कविता शुरू कर सकता हूँ/मृत्यु के बहुत पहली की कविता की तरह/जीवन की अपनी पहली कविता की तरह/किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए.
आभार व्यक्त आलोक कुमार चंदा ने किया.
▪️
‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-108’ की कुछ और सचित्र झलकियाँ-

👉 [बाएँ से] • आलोक कुमार चंदा, गोविंद पाल, वीरेंद्रनाथ सरकार, स्मृति दत्त, प्रदीप भट्टाचार्य और दुलाल समाद्दार

👉 [बाएँ से] • आलोक कुमार चंदा, गोविंद पाल, पल्लव चटर्जी और स्मृति दत्त

👉 [साहित्यिक संगठन के सूत्रधार]
प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के सचिव आलोक कुमार चंदा और ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की उप सभापति श्रीमती स्मृति दत्त

👉 • ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [दिसम्बर, 2025] अंक की प्रति पल्लव चटर्जी को संपादक प्रदीप भट्टाचार्य द्वारा भेंट करते हुए…[इस अंक में पल्लव चटर्जी की कविता इस माह के कवि प्रकाशित हुई है]

👉 [बाएँ से] • आलोक कुमार चंदा, गोविंद पाल, वीरेंद्रनाथ सरकार, स्मृति दत्त, पल्लव चटर्जी और प्रदीप भट्टाचार्य
👉 • ‘मध्यबलय’ के संपादक दुलाल समाद्दार कविता पाठ करते हुए…
[ • रिपोर्ट-प्रस्तुति : प्रदीप भट्टाचार्य : फोटो क्लिक- पल्लव चटर्जी, दुलाल समाद्दार ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)