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- एक हस्तक्षेपकारी बुद्धिजीवी, चिंतक एवं विचारक डॉ. वीरेंद्र यादव का असामयिक निधन : नहीं रहे देश के बड़े दिग्गज आलोचक, प्रखर वक्ता और राष्ट्रीय ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के अध्यक्ष मंडल के सदस्य डॉ. वीरेंद्र यादव.
एक हस्तक्षेपकारी बुद्धिजीवी, चिंतक एवं विचारक डॉ. वीरेंद्र यादव का असामयिक निधन : नहीं रहे देश के बड़े दिग्गज आलोचक, प्रखर वक्ता और राष्ट्रीय ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के अध्यक्ष मंडल के सदस्य डॉ. वीरेंद्र यादव.
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई
प्रख्यात हिंदी साहित्यिक आलोचक एवं विचारक डॉ. वीरेंद्र यादव का आज [16 जनवरी, 2026] लखनऊ में हृदय गति रुकने से 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया.

05 मार्च, 1950 को उत्तर प्रदेश [जौनपुर] में जन्में डॉ. वीरेंद्र यादव ने लखनऊ में प्रारंभिक शिक्षा के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए किया. छात्र जीवन में ही वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के साथ-साथ पत्रकारिता से भी जुड़ गए थे.
डॉ. वीरेंद्र यादव हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण आलोचक, चिंतक और बुद्धिजीवी थे. उनका जीवन साहित्य-समालोचना से सामाजिक-राजनीतिक विमर्श तक विस्तृत रहा. वे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ से अंत समय तक जुड़े रहे. नवें दशक की शुरुआत में उन्होंने राकेश जी के साथ मिलकर ‘प्रयोजन’ पत्रिका का संपादन किया.
डॉ. वीरेंद्र यादव की रचनाओं में प्रमुख हैं-
* विवाद नहीं हस्तक्षेप
* उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता
* हिंदी उपन्यास के सत्ता, उपन्यास और देश एवं विमर्श और व्यक्तित्व
* मार्क्सवादी-प्रगतिशील अवदान
डॉ. वीरेंद्र यादव की आलोचना मार्क्सवादी और प्रगतिशील संदर्भ में रही, जिसमें साहित्य समाज की सत्ता और अंतर्विरोध को उजागर करने का माध्यम माना गया. उनकी रचनाएं केवल तकनीकी आलोचना तक सीमित न रहकर सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विमर्श को भी अपना विषय बनाती थी.
डॉ. वीरेंद्र यादव ने सिद्धातों, धाराओं और आलोचनात्मक परंपराओं में सवाल उठाने और हस्तक्षेप करने की महत्ता पर बल दिया और समकालीन बहसों में सक्रिय भागीदारी की.
डॉ. वीरेंद्र यादव की रचनाएं हिंदी साहित्य में आलोचनात्मक विमर्श को नई दिशा देने वाली मानी जाती हैं. आलोचना में उन्होंने पाठ, समाज, राजनीति और संस्कृति के बीच के गहन अंतरसंबंधो को प्रकट किया.

‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ के राज्य महासचिव परमेश्वर वैष्णव ने बताया कि-
छत्तीसगढ़ [बिलासपुर] में आयोजित ‘प्रसंग मुक्तिबोध’ आयोजन में हम बहुत करीब हुए. ठहरने और आयोजन स्थल पर हम छत्तीसगढ़ के सभी साथी साथ-साथ रहे. विगत माह लखनऊ में कैफ़ी आज़मी अकादमी सभागार में भी मैं {परमेश्वर वैष्णव}, डॉ. वीरेंद्र यादव और कथाकार लोकबाबू मंच साझा किए. उफ! बहुत ही असहनीय पीड़ा हो रही है हम सबको. आज के भयावह समय में एक सुलझे हुए विचारवान प्रखर वक्ता साथी को खोकर. हमारे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के ओजस्वी जुबान वाले प्रतिबद्ध साथी वीरेंद्र जी का जाना भारतीय उपमहाद्वीप में सम्पूर्ण साहित्य बिरादरी के लिए अपूर्णीय क्षति है. ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ की ओर से सादर शत् शत् नमन, विनम्र श्रद्धांजलि

👉 • ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ द्वारा बिलासपुर में आयोजित ‘प्रसंग मुक्तिबोध’ आयोजन के अंतर्गत पुस्तक विमोचन करते हुए डॉ. वीरेंद्र यादव [बाएँ से] सुरेश चंद्र रोहड़ा, डॉ. मृदुला सिंह, प्रो. जय प्रकाश, डॉ. वीरेंद्र यादव, रनेंद्र, लोकबाबू, रफीक खान और परमेश्वर वैष्णव.

👉 • ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ के साथियों के साथ डॉ. वीरेंद्र यादव
[ • प्रस्तुति- ‘छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ के राज्य महासचिव एवं ‘प्रलेसं’ भिलाई-दुर्ग के अध्यक्ष परमेश्वर वैष्णव. ]
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