कविता आसपास : बसंत पंचमी पर महाकवि ‘निराला’ को याद करते हुए… महाकवि की वेदना…!! – विद्या गुप्ता [छत्तीसगढ़-दुर्ग]

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जब जब भी तुम रोते हो
मैं तुम हो जाता हूँ
रोक नहीं पैसा स्वयं को
तरल हो बह जाता हूँ

महाकवि की वेदना…!!
– विद्या गुप्ता
जब जब भी तुम रोते हो
मैं तुम हो जाता हूं
रोक नहीं पाता स्वयं को
तरल हो बह जाता हूं
जब-जब भी
तुम्हारी आंखों से बहा पानी
मेरी आंखों में खून उतर आता
तुम्हारी वेदना धारा में
सूखा नहीं रह पाता हूं
शायद इसलिए ही पढ़ लेता हूं
पत्थर तोड़ती उंगलियों का बयान
पसलियों में धंसी भूख , और
हथेली पर फैलती हलचल को
तुम्हारे घर का अंधेरा
इजाजत नहीं देता
मेरे घर चिरागों को जलने की
तुम्हारे कंधे की सिहरन
छीन लेती है
मेरे कांधे का कंबल
तुम्हारी भूख ले लेती है
मेरे मुंह का निवाला
जब सहन नहीं कर पाता
तुम्हारी भूख का रोटी रोटी चिल्लाना
मैं कम्युनिस्ट हो जाता हूं
तुम्हारे पक्ष में
सांप्रदायिक हो जाता हूं मैं
भूल कर गीतों की लहरी
तुम्हारे पक्ष में
आवाज हो जाता हूं मैं
ओ मेरी कविता के महापात्र
बहुत अंतर है
तुम्हारी और मेरी पीड़ा में
तुम मुक्त हो जाते हो
भोग कर देह की पीड़ा
मेरा कवि भोगता है
पीड़ा को निरंतर ,मृत्युपर्यंत
मैं चुप नहीं रहूंगा
लिखूंगा आग में कलम डूबा कर
उन सांसों का हिसाब जो
डूब गए सुनहरी ताल में
गुलाब दे नहीं पाएगा जवाब
निरुत्तर झुक जाएगा जब
कुकुरमुत्ता अपने प्रश्नों को
दोहराएंगे….!!
• कवयित्री संपर्क-
• 96170 01222
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chhattisgarhaaspaas
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