स्तम्भ : कविता आसपास ‘आरंभ’ – सुष्मा बग्गा
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• नयन

नयन की सुंदरता नयन से
नयनों का सुख नयन को ,
मिलन नयन का हो नयन से
बिन शब्दों के करते बातें
बिन अधरों के देखो ये नयन
मधुर – मधुर स्वर टपकाते
तनहाई में जब नयन, करें नयन से बात
तब नयनों के नयन से
होती है॔ बरसात ,
मन झूठा, अधर झूठा नयन सत्य ही दर्शाते
ये नयन ही कितने आलोक बिछाते,
नयन की सुंदरता नयन से |||
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• उलझन

सभी उलझे हैं
अपने उलझन में किसे कहूँ क्या उलझन मन की ,
किसे बताऊँ पीड़ा दिल की ,
ले लेती हैं हमारे आत्मबल की
परीक्षा भी ,
सभी उलझे हैं अपने उलझन में,
कौन सुनेगा मेरी उलझन को
उलझने करती हैं
परेशान ,
देती है कष्ट हमारे अंतरस को ,
यूँ ही उलझ जाता हैं मन उलझन में |||
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• आँसू और खामोशी

जहां आंसू और खामोशी है।
वहां दर्द भरी खामोशी है।।
हर दर्द में आंसू होता है।
खामोशी से आंसू पीता है।।
आंसू और खामोशी,
एक सिक्के के दो पहलू हैं।
दुख से खामोशी छाती है,
दर्द से आंसू गिरते हैं।।
आंसू और खामोशी का,
बहुत पुराना रिश्ता है।
खामोशी से रहता मन,
झर झर आंसू बहता है।।
जुबा बोल ना पाए,
तो खामोशी छा जाती है।
जुबा बोल ना पाए तो,
आँखें आंसू बहाती हैं।।
बच्चों का आंसू देख,
मां बाप दहल जाते हैं।
पर, मां-बाप की खामोशी,
बच्चे देख न पाते हैं।।
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• बचपन

जब कभी किस्से,
मुझे बचपन के याद आते हैं।
चल फिर वहीं लौट चलें,
ये अंदर से आवाज़ आते हैं।।
ना अतीत का कुछ उधार था।
ना वर्तमान का आतंक था।
आने वाली चौनौतियों से तो,
मन पूरी तरह अनजान था।
आज की उठती आंधियों से,
जब पग कभी डगमगाते हैं।
चल फिर वहीं लौट चलें,
ये अंदर से आवाज़ आते हैं।।
मिट्टी के खिलौने ही,
सबसे बड़े मसले थे।
उन्हें बस्ते में समेट लें,
बस यही तो सपने थे।
तृष्णा का ताप से,
तन बिल्कुल अनजान था।
दुपट्टे का घरौंदा ही,
मेरा मनचाहा मकान था।
पहाड़ सी ऊंची उलझनों से,
आज जब मन मेरे घबराते हैं।
चल फिर वहीं लौट चलें,
ये अंदर से आवाज़ आते हैं।।
रिश्तों में प्रेम की सुगंध थी,
हाथ भाई बहन के हाथ था।
तू जिए हजारों साल,
बस एक ही तो उनसे स्वार्थ था।
अपनों का दूर जाना,
आज जब हमें रुलाते हैं,
चल फिर वहीं लौट चलें,
ये अंदर से आवाज़ आते हैं।।
[ • सुषमा बग्गा छत्तीसगढ़ रायपुर से हैं. निरंतर लेखन में सक्रिय हैं. शिक्षण से जुड़ी हुई हैं. एमए {अर्थशास्त्र, इतिहास} एवं डिप्लोमा की डिग्री प्राप्त की है. • साझा संकलन ‘शब्द सागर’, ‘निहारिका’, ‘पराग’, ‘सुनहरे पन्ने बचपन के’ ‘अनुनाद लघु कथा’ और ‘बाल मन’ कृति प्रकाशित हुई है. • अनेकों सम्मान से सम्मानित एवं प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सदस्य सुषमा बग्गा जी की कविताएं समाज को दिशा देती है, कविताएं प्रगतिशील है. – संपादक ]
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chhattisgarhaaspaas
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