अब मैं क्या करूँ… क्योंकि वह किसी की – कैलाश जैन बरमेचा
अब मैं क्या करूँ, अब मैं क्या करूँ,
लाडो को तो जाना ही था क्योंकि वह मेरी नहीं थी,
वह किसी की अमानत थी।
ख़ून हमारा था, लगाव हमारा था,
चिंता हमारी पूरी थी,
पर अमानत किसी और की थी।
वह आई थी कुछ दिनों के लिए,
मुझे चार्ज करने और खुद भी चार्ज होने।
मैं हर पल डरता रहा—
कहीं ज़्यादा हँसी न हो जाए,
कहीं ज़्यादा लाड़ न हो जाए,
क्योंकि वह किसी की अमानत थी।
वह सरपट-सरपट सीढ़ियाँ चढ़ती,
और मेरी धड़कनें
हर सीढ़ी के साथ गिनती बढ़ातीं।
कहीं फिसल तो नहीं गई?
कहीं गिर तो नहीं गई?
मैं हँसता भी था
और भीतर-ही-भीतर डरता भी,
क्योंकि वह किसी की अमानत थी।
मेरी टेबल तक आती,
पेन के डब्बे खोल देती,
सारी पेन बिखेर देती।
मैं बनावटी गुस्से में कहता—
“अरे लाडो, क्या कर रही है?”
और फिर तुरंत डर जाता—
कहीं डाँट ज़्यादा तो नहीं हो गई?
मैं कहता—
“चलो, मुँह में उँगली रखकर
चुपचाप बैठ जाओ।”
और वह सचमुच
मुँह में उँगली रखकर बैठ जाती।
उसकी आज्ञाकारिता पर
मेरा मन पिघल जाता,
पर डर फिर भी रहता,
क्योंकि वह किसी की अमानत थी।
खाने की थाली में
उँगली डाल देती,
चट्टी-चट्टी करती,
मैं बोलता—
“नहीं लाडो, ऐसे नहीं।”
वह तुरंत मान जाती।
मेरी डाँट में भी
वह डर ढूँढ लेती थी,
और मैं डर में भी
प्यार ढूँढ लेता था।
घर में उसके होने से
उजाला फैल गया था।
मन में मस्ती छा गई थी।
जिधर देखो उधर लाडो,
और लाडो की आँखों में
हर तरफ़ उसका नाना।
जब मैं घर से बाहर जाता,
वह दरवाज़े तक आती,
मुझे निहारती।
कुछ दिनों बाद
मेरे स्कूटर पर बैठकर
एक चक्कर घूमने भी जाने लगी।
मैं जल्दी लौट आता,
क्योंकि देर होने से डर लगता,
क्योंकि वह किसी की अमानत थी।
मंजू नानी…
उसका प्यार डर से भी बड़ा था।
एक-एक पल, एक-एक सेकंड
चिंता में कटता।
“लाडो कहाँ गई?”
“किस कमरे में चली गई?”
“कहीं गिर तो नहीं गई?”
“कहीं हाथ-पैर में दर्द तो नहीं?”
वह हर कमरे में जाती,
नज़रें पहले लाडो को खोजतीं।
वह भी जानती थी,
ख़ून हमारा है,
पर अमानत किसी और की है।
आज मंजू नानी
दिनभर इंतज़ार करती है—
कब लाडो कॉल करेगी,
कब वीडियो कॉल आएगा।
सड़क की ओर देखती है,
हर आहट में कहती है—
“लाडो मेरी आ रही है…
लाडो मेरी आ रही है…”
पदमेश…
कम बोलता है,
पर भावों में डूबा रहता है।
लाडो तू क्या खाएगी?
तेरे लिए क्या लाऊँ?
दिनभर
एक ही चिंता,
एक ही सवाल।
लाडो चली गई,
तो शब्द कम हो गए,
भाव और गहरे हो गए।
वह चली गई…
पूरी तरह चार्ज होकर।
और हम सब
धीरे-धीरे
डिस्चार्ज हो गए।
तबला है,
पर थिरकन नहीं।
कमरे हैं,
पर आहट नहीं।
खाना है,
पर स्वाद नहीं।
अब मैं क्या करूँ,
अब मैं क्या करूँ।
अमानत लौट गई,
धर्म पूरा हो गया।
पर यह खालीपन
किसके पास जमा कराऊँ?
लाडो फिर आएगी,
मुझे यक़ीन है।
फिर डरेंगे,
फिर सँभालेंगे,
फिर खुद को भूलकर
उसे चार्ज करेंगे।
क्योंकि नाना,
नानी और मामा का
एक ही धर्म है—
अमानत को
पूरे प्यार,
पूरे डर
और पूरी ईमानदारी से
लौटाना।
अब मैं क्या करूँ…
अब मैं क्या करूँ…
[ • कवि, लेखक कैलाश जैन बरमेचा प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक हैं. ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)