स्तम्भ : कविता आसपास ‘ आरंभ’ – अमृता मिश्रा
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एक कदम
– अमृता मिश्रा
[ दिल्ली पब्लिक स्कूल, भिलाई, छत्तीसगढ़]

एक क़दम
इतना-सा ही तो फ़ासला है
खड़े रहने और चल पड़ने के बीच,
पर यहीं तय होता है
कि हम भीड़ हैं
या मनुष्य।
एक क़दम दरवाज़े से बाहर,
जहाँ प्रश्न हवा में लटके हैं
और उत्तर
फ़ाइलों में बंद पड़े हैं।
जहाँ सुविधा का तकिया
विवेक के सिरहाने रखा है
और हम रोज़
बेचैन नींद को
समझदारी कह देते हैं।
एक क़दम भीड़ से हटकर,
जहाँ आवाज़ें बहुत हैं
पर सोच का अकाल है।
जहाँ तालियाँ
हर झूठ को सच बना देती हैं
और भूख
भाषणों में तृप्त हो जाती है।
एक क़दम सवाल बनकर—
जब बच्चा पूछता है,
गलत के ख़िलाफ़ बोलना गलत क्यों है?”
और हमारे पास
चुप्पी के सिवा
कोई विरासत नहीं होती।
एक क़दम बदलाव की तरफ—
जहाँ कथनी और करनी
एक-दूसरे को पहचानती हैं।
जहाँ धर्म
इंसानियत से बड़ा नहीं
और सफ़ाई
सिर्फ़ नारों तक सीमित नहीं।
एक क़दम—
जो डराता है,
क्योंकि उसके बाद
हम वही नहीं रहते
जो कल थे।
लोग कहते हैं—
ज़्यादा मत सोचो,
पर इतिहास
सोचने वालों से ही आगे बढ़ा है।
याद रखो—
जब तुम एक क़दम रखते हो,
धरती समझ जाती है
कि कोई बोझ नहीं,
कोई ज़िम्मेदारी चल रही है
और जब बहुत-से लोग
अपने-अपने डर से बाहर निकलते हैं,
तो रास्ते
सरकारों से नहीं,
इंसानों से बनते हैं।
तो आज—
कोई बड़ा नारा नहीं,
कोई तख़्ती नहीं,
बस
एक ईमानदार क़दम
क्योंकि हर बदलाव
शोर से नहीं,
कभी-कभी
एक शांत क़दम से जन्म लेता है।
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chhattisgarhaaspaas
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