स्तम्भ ‘आरंभ’ : इस माह की कवयित्री- दीप्ति श्रीवास्तव
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• चूल्ले की आग

टन-टन-टन,
टन-न-न-न…
मुहल्ले की महिलाएँ,
घर के द्वार की ओट से
झाँकती निगाहें—
उत्सुकता और जिज्ञासा से भरी।
छोटा हाथी वाले को
टकटकी लगाए देखतीं—
किस घर का रुख करेगा आज?
जिसके द्वार वह मुड़ जाता,
उनके तो वारे-न्यारे हो जाते,
बाँछें खिल उठतीं—
जैसे सौभाग्य दस्तक दे गया हो।
“भैया, चाय पियोगे?”
इतना मान-सम्मान पाकर
वह भी खिल उठता—
“धन्य हो, हे ‘युद्ध देवता’,
जो आज हमारा मान बढ़ाया!”
और अंत में खुलता रहस्य—
ये कोई देवता नहीं,
“गैस सिलेंडर” वाले भैया हैं ।
• वह लड़का

वह लड़का
भोर की लालिमा से पहले
देखा एक पन्नी बीनने वाली को।
बिखरे, उलझे बाल, मैली-सी देह,
कल तक हँसी थी, जवाँ थी।
मुहब्बत में क्या फँसी,
मानसिक विकलांगता को
गले लगा लिया।
घर-बार छूट गया,
मुहब्बत की मारी
शिक्षा की मिसाल भी
अग्नि को समर्पित हो गई।
मारी-मारी फिरती रही,
फिर भी बच गई
रात को लूटने वाले
उल्लुओं से।
मिल गया उसे
रक्षा करने वाला,
स्नेही भाई-सा एक इंसान।
वह भी था
कचरे से प्लास्टिक बीनने वाला।
पर न था औरों जैसा
अल सुबह उठकर
चल पड़ता था
प्लास्टिक मुक्त धरा बनाने।
अनाथ, पर्यावरण प्रेमी
ले आया उसे
अपने साथ झुग्गी में।
वह भी तो
किसी घर की बेटी थी,
अपने ही हाथों
किस्मत को स्याह कर बैठी।
घर, बार, डिग्री, ठिकाना,
यहाँ तक कि पहचान भी
गर्त में जा चुकी थी।
हाड़-मांस का
चलता-फिरता पुतला बन
सब कुछ सह रही थी।
फिर क्यों
घर वाले उसे अपनाते नहीं?
समाज इतना भय
क्यों खाता है?
वह भी तो
गुदड़ी का लाल है,
जिसने पनाह दी
लावारिस हुई बेटियों को।
महिला दिवस,
महिला सशक्तिकरण—
क्या केवल
स्टेज की शान है?
उठो, जागो,
और समाज को
सच में बदलो ।
• बाल

बाल
काले घने बाल हमारा गर्व
जब वही सफ़ेद होने लगते
चिंता फिक्र बढ़ते
ना ना उपाय करते
जेब ढीली करते
पर कमबख्त बाल
बेशर्म की तरह सफेद होने की होड़ लगाते
डाक्टर पार्लर से थकते
रंगने का सरल उपाय में जुट जाते
प्रारंभ में लम्बे समय रंग टिकता
फिर तो जल्दी ही रंग निकल तनाव बढ़ता
कहीं जाना है तो पहले बाल की हैसियत देखते
बालों की अपनी प्रकृति बदलती
वे जाड़े होने लगते
झड़ने लगते
कभी कभी कपाल दिखने में ना शर्माते
फिर परेशान हो डाक्टर के चक्कर लगाते
बाल सफेद होना और डाक्टर का चक्कर
शहद से नातेदार
नयन धीरे धीरे टिमटिमाने लगते
भवों में भी सफेदी लगती झांकने
केमिकल का असर लगता दिखने
तथापि बाल रंगने का शौक ना छोड़ पाते
सफेद बाल बूढ़े होने का प्रतीक सोचते
खुद को बूढ़ा ना दिखना चाहते
उम्र का असर छुपाना चाहते
या डर सुंदरता का चिरंतन सत्य छूटने का
क्या यह हमारी मानसिकता का प्रतीक?
[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य एवं संभावनाओं को ढुंढती कवयित्री श्रीमती दीप्ति श्रीवास्तव की कहानी श्रृंखला ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ प्रिंट मासिक पत्रिका में क्रमवार प्रकाशित की जा रही है. • दीप्ति श्रीवास्तव की पहली कहानी संग्रह ‘माँ उदास क्यूँ’ प्रकाशित हुई है, इस संग्रह में 25 मार्मिक कहानी है. • इस संग्रह से प्रत्येक माह एक कहानी ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ में छप रही है. • संपर्क- 94062 41497 ]
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