कृति आरंभ : कविता आसपास- दीप्ति श्रीवास्तव

👉 • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य ,उपाध्यक्षा दीप्ति श्रीवास्तव कहानी, कविता लेखन में निरंतर सक्रिय हैं. • दीप्ति जी की एक कहानी संग्रह ‘माँ उदास क्यूँ’ प्रकाशित हुई है, इस संग्रह में 25 कहानी छपी है. 25 कहानी क्रम से प्रतिमाह ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ प्रिंट मासिक पत्रिका में पाठकों के लिए प्रकाशित की जा रही है. ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ फरवरी- 2026 में ‘किल्लत’ और मार्च-2026 में ‘उसका छक्का’ छपी है. • दीप्ति श्रीवास्तव संभावनाशील एवं प्रगतिवादी लेखिका व कवियित्री हैं. – संपादक ]
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• देह

देह से परे मन
देह से परे एक मन होता
जो सपनों को जगाता
बंधनों से आज़ाद होता
अपने हक़ के लिए सजग रहता
देह विषम परिस्थितियों में डरती
पर मन… धैर्य से साथ देता ।
देह में बसी नारी का मन,
जिम्मेदारियों से टूटता रहता क्या करे उस मन का,
जिसमें उसकी आत्मा बसती
क्या उसे ठेल दे दूर कहीं?
अब तक तो वही करती आई है…
अब तो उसे याद भी नहीं देह,
भीतर ‘मन’ नाम की एक चिड़िया बसती थी,
जो कभी चहकती थी
फिर कसमसाने लगी,
फिर धीरे-धीरे निचोड़ी गई।
आख़िरकार… देह ने ही उसे मार डाला।
“क्यों मारा?”
देह ने जवाब दिया—
“बहुत फुदकती थी,
अपने मन की करना चाहती थी,
कर्तव्य के नाम पर
बलि चढ़ना नहीं चाहती थी…
इसलिए मसल डाला।”
चिड़िया हक़ मांगती रही,
देह के दिन सेवा में बिताती रही,
रात भी देह की थकान में ढलती रही।
अंत में जब देह पस्त हो जाती,
तब चिड़िया पंख फैलाना चाहती—
उड़ना चाहती थी…
पर मजबूरियों की मारी देह ने,
बच्चों की बेड़ियां बांध दी,
मन नाम की उस चिड़िया को
देह से परे धकेल दिया…
और देह अपने अधिकार त्याग दिए
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• प्लास्टिक बोतल का बयान

पार्क में पड़ी
अपने भाग्य पर रो रही थी…
कुछ समय पहले तक
शादी-पार्टियों की शान थी,
मुख्य अतिथि के संग
मंच साझा करती थी।
टेबल पर सजी-धजी
नाश्तों को मात देती,
अपने अस्तित्व पर इतराती
“मैं हूँ शुद्धता की पहचान!”
एक-एक घूंट में
अमृत सा एहसास,
मेरे भीतर बंद था
जीवन का विश्वास।
छुआछूत से परे,
अब तो श्मशान तक पहुंच गई
हर जगह मेरी ही पूछ है,
हर हाथ से मैं लिपट गई।
जल तो है हर जगह,
पर “शुद्ध जल” का तमगा
मुझमें ही कैद हो गया
कैसी विडंबना है ये!
और आज…
वही बोतल
पार्क के कोने में पड़ी
अपने भाग्य को कोस रही
“देखो, कैसे इस्तेमाल किया!
पानी पिया…
और मुझे पैरों तले फेंक दिया!”
यही है नई सभ्यता
काम खत्म, तो सम्मान खत्म!
कूड़ेदान दूर खड़ा मुस्कुराता रहा,
और मैं ठोकर बनती रही…
जब तक भरी थी,
तब तक इज्जत थी,
ज़रूरत थी,
तो कद्र थी।
खाली होते ही
न कोई साथी,
न कोई कीमत रही।
खाली बोतल का यह है बयान
धूप-छांव सहती,
यहां से वहां ढोई गई,
पानी ठंडा-गर्म होता रहा,
और मैं चुपचाप घुलती रही…
मेरे अंदर का जल
गला तर करता रहा,
और मेरे बाहर का ज़हर
धीरे-धीरे शरीर में उतरता रहा…
यही विडंबना है
जिसे “स्वास्थ्य” समझ कर अपनाया,
वही चुपके से
सेहत पर वार करता रहा।
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chhattisgarhaaspaas
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