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व्यंग्य- दीप्ति श्रीवास्तव
🤣
• आज का नायक
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़-भिलाई-दुर्ग ]

आज घर में कदम रखते से घर का माहौल कुछ तनाव भरा लगा । समझ नहीं आया सुबह ऑफिस के लिए हंसी खुशी विदा किया था पत्नी जी ने , फिर क्या हुआ ? इस बीच तो हमारे साथ फोनवा पर बात भी नहीं हुई । हमारा मन मस्तिष्क पूर्वानुमान लगाने में असमर्थ था । पहले से कुछ बोल दिया तो गुब्बारा हम पर ही न फूट जाए इसलिए बिटिया को कमरे में ऑफिस के कपड़े बदलते हुए पूछा ‘आज घर में कोई आया था या किसी का फोन आया था क्या ? बिटिया भी अनभिज्ञ मतलब मामला गंभीर है।
बच्चों को भी मां के तनाव का कारण पता नहीं चल रहा था । ‘हिम्मत से काम लो पतिदेव हमारे अंदर से आवाज आई तुम मर्द हो ‘ फिर क्या था खुद से कहा ‘बी पॉजिटिव’और गरमा गरम चाय का कप लेकर आई पत्नी से कहा ‘अरे रामप्यारी तनिक एक घूंट तुम भी पी लो ।’ और हमारा इतना कहना और पत्नी जी का फटना जैसे सिलेंडर से गैस नहीं, गुस्सा लीक हो रहा हो । ‘देखो न जी आज हमारे पड़ोसी के घर एल पी जी सिलेंडर आया ।’ ‘इसमें कौन सी बडी बात है सब के घर आता है ।’
‘आप तो दुनियादारी समझते नहीं।’ कितने गर्व से मुहल्ले में सबको बताते फिर रही है आज उनके घर सिलेंडर महाराज पधारे है। दूसरे लोग जलन से दोहरे हो रहे है। सिलेंडर वाला छोटा हाथी जब मुहल्ले में पहुंचा और सिलेंडर की टन टन की आवाज जब घरों में पहुंची तब अब स्त्रियां अपने घरों के दरवाज़े से उत्सुक और जिज्ञासावश बाहर निकल आई । देखे किसके घर की ओर सिलेंडर वाले भैया जाते है । जिस दरवाजे पर पहुंचेंगे उसके तो वारे न्यारे हो जायेंगे। उनका मुहल्ले में आगमन आजकल हलचल पैदा करता है । वह भी अपने आप को वी आई पी समझने लगे है। इस युद्ध ने उनको विशेष स्थान दिया इसलिए वे युद्ध देवता को प्रणाम कर श्री फल चढ़ा दिया । जीवन में उन जैसे आदमी की इतनी खातिरदारी कभी नहीं हुई । जिस घर सिलेंडर महाराज को पहुंचाने जाते है वहां उन्हे चाय नाश्ता के लिए पूछा जाने लगा । बड़ा आदर सम्मान इन दिनों मिल रहा है।
घूरे के दिन फिरते है सुना था पर युद्ध के कारण सिलेंडर वाले भैया के दिन फिरेगा यह मालूम न था । देखो पड़ोसन की किस्मत इतने भीषण युद्धकाल में भी एलपीजी गैस नम्बर लगाने पर समय पर उनके घर सिलेंडर महाराज पहुंच गए । अगर मेरे घर आते तो मैं उनकी अगवानी गाजे बाजे के साथ करती ।
पतिदेव बीच में बोल पड़े तुरंत उन्हें अपनी इस गलती का अहसास हुआ। क्या करे तीर बाण से निकल चुका था अब उसकी दिशा नहीं बदली जा सकती। पर दूसरे वाक्य से कुछ तो भरपाई की ही जा सकती थी ।
तुम्हारा सिलेंडर खाली होगा तो नम्बर लगा कर डीजे वाले से बात कर लेना कोई खर्चे से डरने की जरूरत नहीं । आख़िर हमारे घर सिलेंडर महाराज पधारेंगे तो सबको पता होना चाहिए। सिलेंडर वाले भैया से कहना सिलेंडर महाराज को लाने के पूर्व तुम्हें सूचना अवश्य दे देंगे । यह बात पत्नी को जम गई।
आज की तारीख में ‘अतिथि देवो भव:’ के स्थान पर ‘सिलेंडर देवो भव:’ ही महत्वपूर्ण है ।
[ • दीप्ति श्रीवास्तव, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य उपाध्यक्ष हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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