साहित्यिक ‘आरंभ’ : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
▪️
• सरोगेट मदर
– सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
[ • दुर्ग-छत्तीसगढ़ ]

मैं बनना चाहती हूँ सरोगेट मदर,
पर नहीं जनना चाहती मानव की संतानें।
क्योंकि मानव और उसका अस्तित्व
इतना संकटग्रस्त नहीं है,
जितनी संकटग्रस्त है
पशुओं, पक्षियों और पौधों की
पल-पल सिमटती हुई ज़िंदगी।
मेरा भय केवल भय नहीं,
एक कठोर वास्तविकता है।
क्योंकि कम होते-होते
विलुप्त हो चुकी हैं अनेक प्रजातियाँ,
कुछ जानी-पहचानी,
कुछ अनजानी।
अब वे जीवित नहीं,
किताबों के पन्नों में कैद शब्द हैं,
या संग्रहालयों की दीवारों पर टंगे चित्र,
जिन्हें केवल आवश्यकता पड़ने पर
खोजा और पढ़ा जाता है।
इसलिए मैं जनना चाहूँगी
पशु-पक्षियों के अंश,
उनकी संततियाँ।
और कर देना चाहूँगी
अपनी कोख किराए पर—निःशुल्क।
क्योंकि शायद भविष्य में
संभावना हो ऐसी संतति जन्माने की,
संभावना हो
टूटते जीवन-चक्र को बचाने की।
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ
उन्हें उनकी समाप्ति से पहले देख सकें,
समझ सकें उनके योगदान को,
उनके अस्तित्व के छल लिए जाने से पहले।
जैसे चित्रों में आज भी
मुझे शेर और भूरी-पीली बिल्ली
कभी-कभी एक से लगते हैं,
पर उनकी आवाज़ बता देती है
कि दोनों एक नहीं हैं।
मेरे हमउम्र लोगों का सौभाग्य रहा है
कि वे इस अंतर को समझ पाए,
जंगल की दहाड़ और आँगन की म्याऊँ
दोनों को सुन पाए।
पर क्या भावी पीढ़ी का भाग्य भी ऐसा होगा?
क्या वे शेर को केवल तस्वीरों में जानेंगे?
क्या पक्षियों का संगीत
मोबाइल की रिकॉर्डिंगों में सिमट जाएगा?
क्या जंगलों की स्मृतियाँ
केवल पाठ्यपुस्तकों का अध्याय बनकर रह जाएँगी?
पर क्या भावी पीढ़ी का भाग्य ऐसा होगा?
इसीलिए मैं बनना चाहती हूँ सरोगेट मदर।
इसीलिए मैं बनना चाहती हूँ सरोगेट मदर।
ताकि बार-बार प्रकृति को जन्म दे सकूँ,
ताकि हर बार
एक जंगल, एक नदी, एक चिड़िया,
एक तितली, एक हिरण
मेरी कोख से होकर
भविष्य तक पहुँच सके।
ताकि जीवन बचा रहे,
ताकि पृथ्वी बची रहे,
ताकि प्रकृति
हर बार फिर से जन्म ले सके।
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)