साहित्यिक पटल : सुरभि ताम्रकर ‘शावि’

[ • छत्तीसगढ़ दुर्ग की सुरभि ताम्रकर ‘शावि’ उभरती हुई युवा कवयित्री है. इस अंक में इनकी दो रचना ‘रैलियों का व्यापार’ और ‘आँखों की विरासत’ प्रकाशित कर रहे हैं. – संपादक ]
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• रैलियों का व्यापार

लोकतंत्र सचमुच महान है,
यहाँ भीड़ भी किराए पर मिल जाती है,
और कई बार
विवेक मुफ्त में चला जाता है।
आजकल रैलियों का बड़ा व्यापार है,
यह एक सफल स्टार्टअप है।
न अनुभव की आवश्यकता,
न किसी विशेष योग्यता की दरकार है।
जाति, धर्म, लिंग—
किसी प्रकार का भेदभाव नहीं।
जो आए, उसका स्वागत है।
लोकतंत्र में अवसर सबके लिए समान है।
आने-जाने की व्यवस्था,
भोजन-पानी की सुविधा,
और कहीं-कहीं प्रोत्साहन राशि की भी व्यवस्था है।
रोजगार कार्यालयों से अधिक सक्रिय
यह व्यवस्था प्रतीत होती है।
इसलिए मैं भी सोच रही हूँ,
दो-चार प्रशिक्षित दल बना दिए जाएँ।
एक नए प्रकार का रोजगार
यहाँ से भी संभव है।
मुद्दों की कमी तो है नहीं देश में,
और फंडिंग का क्या है—
पक्ष हो या विपक्ष,
अंततः चाहिए तो भीड़ ही।
हमारे पास विशेष योजनाएँ होंगी—
“लाठी प्रहार सहन दल”
उन युवाओं के लिए
जो लोकतंत्र का भार अपनी पीठ पर उठाने को तत्पर हों।
“जेल यात्रा इच्छुक दल”
गिरफ्तारी के साथ फोटो और अनुभव सहित।
“नारा विशेषज्ञ दल”
हर विचारधारा के लिए अलग पैकेज उपलब्ध।
“ताली एवं उत्साहवर्धन दल”
भाषण के कमजोर हिस्सों को भी
जनसमर्थन जैसा दिखाने हेतु।
क्योंकि सरकार रोजगार दे न दे,
अनुभव प्रमाणपत्र हमारे पास है नहीं,
और प्रतियोगी परीक्षाओं की आयु भी
धीरे-धीरे बीत रही है।
तो ऐसे पार्ट-टाइम रोजगार में
हर्ज ही क्या है?
कम से कम यहाँ
योग्यता नहीं, संख्या देखी जाती है;
विचार नहीं, उपस्थिति गिनी जाती है;
और भविष्य नहीं,
भीड़ का आकार तय करता है
कि कार्यक्रम कितना सफल है।
इसलिए मुझे आवश्यता है युवाओं की
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• आँखों की विरासत

हाँ, मुझे पसंद है
अपनी आँखों का ख़याल रखना।
और कोई कह दे कि
काजल इन्हें नज़र से बचाती है,
तो मैं कभी-कभी
लगा लिया करती हूँ इन्हें।
मैं चाहती हूँ कि
मेरे जाने के बाद
ये किसी की ज़िंदगी का
हिस्सा हो लें।
और वह नज़रिया भी सीखें
जो लोग देखना नहीं चाहते।
कितनी सुखद बात है कि
प्राण जाने के बाद भी
आँखें ज़िंदा रहकर
इस प्रकृति को देख सकती हैं।
और फिर मुझे
मरने के बाद भी
जी लेने का शौक भी है।
मैं इस अनर्गल बात को
मान नहीं पाती कि
बिन आँखों के
अंत्येष्टि का हिस्सा रहे लोगों को
ईश्वर अगले जन्म में
अंधा कर भेज देते हैं।
मेरे बाद
मेरी आँखें सँभालने वाले,
अगर विज्ञान आगे बढ़ पाए,
तो फिर से दान कर देना इन्हें।
चूंकि ये भी
मेरी विरासत ही होंगी।
मैं जिंदा रहूंगी इनमें।
क्योंकि शावि,
अपनी उम्र से अधिक
दो-तीन पीढ़ियों तक
इस प्रकृति को
हरा-भरा, प्रसन्न और जीवंत
देखने के सपने देखती है।।
इसलिए
मेरे जाने के बाद भी
मेरी दृष्टि को
जीवित रख ”
मेरी आंखों के विरासत” का हिस्सा कर देना इन्हें।
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chhattisgarhaaspaas
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