कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

[ • बांग्ला के सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कवि पल्लव चटर्जी हिंदी में भी निरंतर काव्य सृजन कर रहे हैं. विगत दिनों पल्लव चटर्जी को बांग्ला देश के विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया. • ‘बांग्ला कवितांगन’, विश्व बांग्ला साहित्य प्रसार अकादमी से अनुमोदित ‘पूर्व संग साहित्य परिषद् ट्रस्ट’ और ‘खुलना साहित्य परिषद्’ से उत्कृष्ट कविता के लिए सम्मानित किया गया. • आप प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आजीवन एवं संस्थापक सदस्य हैं.- संपादक ]
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• कोहनी

जहाँ भीड़ हो जाए
कोहनी का इस्तेमाल होता है
धक्का मारकर जगह बनाने के सिवा
इसकी कोई और इतिहास नहीं।
कहो तो सभ्यता सीखी ही नहीं
इंसान का पुनर्जन्म हो तो
फ्री पास की तरह—
कोहनी साथ ही आती है।
उठती-गिरती है जीवन भर।
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• जन्मदिन

एक दिन जन्मा था मैं,
उसी दिन के सहारे
टिके हैं सारे रिश्ते मेरे।
जानता हूँ, ये धरती
मेरे बिना भी
वैसे ही घूमेगी सदा।
हर पल यूँ ही होता है—
कोई आता, कोई जाता,
आने-जाने का मेला है।
दुनिया का ये आयोजन
बहुत पुराना है,
बस चेहरे बदलते रहते।
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• कॉकरोच चल रहे दिन-रात

काकरोच बढ़ रहे दिन-रात
सड़कें हिलाएँगे अब तख़्ती हाथ में
शिक्षा, रोज़गार की फ़िक्र जितनी
वे आंदोलन में उतरेंगे अपनी रीति।
नौकरी की परीक्षा के पेपर लीक
नई पीढ़ी का ये सबसे बड़ा ज़ख्म
आम घरों के लड़के-लड़कियाँ
तैयारी करते हैं बहुत उम्मीद लेकर।
परीक्षा नहीं होती वक़्त पर
ख़ुदकुशी का रुझान बढ़ता है उतना
राज्य ख़ामोश! तो ज़िम्मेदार कौन?
सड़कों पर काकरोच उतरे हैं हज़ारों।
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• इंसान के बहुत करीब मत जाओ

इंसान के पास जाकर ही सीखा है
कि उनके बहुत करीब जाना नहीं चाहिए
इंसान कब किसे कैसे अपनाएगा
कहना बहुत मुश्किल है।
वो क्या नहीं कर सकता
अपने स्वार्थ के लिए
कभी बाघ की तरह हिंस्र हो सकता है
कभी साँप की तरह डस कर
ज़हर उगल सकता है,
सच को मुखौटे के नीचे छुपाकर।
इसलिए उनसे एक दूरी बनाए रखना ही अच्छा है।
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• जन्मे तो मरना ही है

सब कहते हैं
जन्मे तो मरना ही है
…………………..
जीवन का नियम।
कोई नहीं समझता ये
माँ चले जाने पर
खुद को मृत सा
क्यों लगता है?
क्या बेवजह ही
जीवन भर याद रखता है उसे संतान!
कौन देगा उत्तर?

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chhattisgarhaaspaas
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