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विशेष : ‘हरेली’ पर्व का लोक भाव – बलदाऊ राम साहू

मनुष्यता का अभिप्राय परहित में सुख का अनुभव करना। इसीलिए सामाजिक परंपरा में मनुष्य एक-दूसरे के काम आते हैं। एक-दूसरे की मदद के बिना किसी का काम नहीं होता। लोक-परंपरा में सभी काम एक-दूसरे की मदद से ही चलते रहते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी जगह अटक जाता है, तब दूसरा उसकी मदद के लिए आगे आता है। इसी तरह लोक-समाज में दायित्व निर्वाह होता है। समाज में कोई भी व्यक्ति पूरी तरह समर्थ नहीं होता। कहा भी गया है— “राजा घलो मूसर बर अटक जाथे।” अर्थात राजा भी कभी-कभी मूसल जैसी छोटी चीज़ के लिए अटक जाता है।
छत्तीसगढ़ी शब्दकोश में ‘धन्यवाद’ शब्द नहीं है। कई लोग पूछते भी हैं कि ‘धन्यवाद’ को छत्तीसगढ़ी में क्या कहा जाता है? प्रत्येक भाषा में सभी शब्द रहें, ऐसा ज़रूरी नहीं है। शब्द का निर्माण लोक की आवश्यकता के अनुरूप ही होता है। छत्तीसगढ़िया मनुष्य एक शब्द में ‘धन्यवाद’ नहीं कहता। वह कहता है— “बने करेस ददा, तैं हर मोर बर भगवान बरोबर आ गेस। भगवान तोर बढ़ोत्तरी करे।” अर्थात अच्छा किया भाई/ बाप, तुम मेरे लिए भगवान की तरह आ गए। भगवान तुम्हारी उन्नति करे। इस तरह वह तरह-तरह के आशीर्वाद देता है। उसकी आँखों में आभार के भाव को पढ़ा जा सकता है। यह भाव संपूर्ण जीव-जगत में भी दिखता है, यह बात यहाँ केवल मनुष्यों पर ही लागू नहीं होती। यदि आप किसी भी जीव की विषम परिस्थितियों में मदद करते हैं, तब उसकी आँखों में भी भीतर से धन्यवाद का भाव दिखता है।

जब सावन का महीना आता है, तो चारों तरफ़ हरियाली बिखर जाती है। प्रकृति झूमने-नाचने लगती है। सभी जीव-जंतुओं के मन में उमंग छा जाती है। हरे-हरे पेड़-पौधे जब पुरवाई (पूर्वी हवा) के साथ झूमते हैं, तब ऐसा लगता है मानो प्रकृति अपने मन के उल्लास को व्यक्त करने के लिए नाचने लगी है। किसान के मन में हर्ष और उल्लास का भाव दिखता है। धरती की महिमा प्रकट रूप में दिखाई देती है। गाय-बैलों के चेहरे भी साफ़-सुथरे/चमकदार दिखाई देते हैं; चार महीने की धूप में झुलसे हुए जीव बारिश के आने से हरे-भरे (तृप्त) हो जाते हैं।
छत्तीसगढ़ के लोकजीवन और पर्व-परंपरा में खेती-किसानी की परंपरा का बहुत बड़ा स्थान है। एक तरह से खेती छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन में पूरी तरह रची-बसी है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति के मूल में खेती और जंगल का प्रभाव दिखाई देता है। यदि हम अच्छे ढंग से छत्तीसगढ़ की संस्कृति को जानना चाहते हैं, तब हमें कृषि परंपरा और जंगल के विश्वासों को खंगालना (टटोलना) पड़ेगा। जब हम किसी परंपरा के आंतरिक भाव को टटोलते हैं, तब उसमें बहुत गहरी बात दिखाई देती है। हमारे बुजुर्गों ने किसी परंपरा को बनाया है, तो उसे सोच-विचार कर ही बनाया होगा। उसमें भाव-तत्त्व के साथ-साथ विज्ञान भी छिपा है। बात केवल जानने और समझने की है। जब हम अपने पर्व और परंपरा के भाव को जानेंगे, तब उससे हमारा जुड़ाव होगा, उसके प्रति श्रद्धा और विश्वास का भाव जागेगा और हम पर्व-परंपरा को हृदय से स्वीकार करेंगे।

‘हरेली’ उत्सव छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख और कृषि परंपरा से संलग्न पर्व है, जो मुख्य रूप से सावन मास की अमावस्या को मनाया जाता है। यह त्योहार हरियाली, प्रकृति, और अच्छी फसल की कामना का प्रतीक है। ‘हरेली’ का त्योहार हमारी खेती-किसानी की परंपरा से गहरा सरोकार रखता है। हरेली इसलिए क्योंकि छत्तीसगढ़ की सभी परंपराएँ किसी न किसी रूप में खेती की परंपरा से जुड़ी हुई हैं। यहाँ की सभी परंपराओं में आनंद का भाव दिखाई देता है। जब हम किसी त्योहार को मनाते हैं, तब उसकी परंपरा के साथ एकाकार हो जाते हैं। ‘हरेली’ केवल एक पर्व मात्र नहीं है; उसमें छत्तीसगढ़ का भाव-तत्त्व बसा है। छत्तीसगढ़ के लोग भावना प्रधान जीवन जीते हैं और वे केवल प्रेम/भाव के भूखे होते हैं।
’हरेली’ का पर्व किसानों के लिए बहुत बड़ा पर्व होता है। इस दिन किसान अपने खेती-किसानी के सभी औजारों की पूजा-अर्चना करते हैं। हल, बखर, कुदाली, रापा (फावड़ा), चटवार, गैंती, साबर—इन सभी को धो-पोंछकर इनकी पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं। क्योंकि इन सभी उपकरणों के सहयोग के बिना उनका कोई काम पूरा नहीं हो सकता। जब हमें किसी का सहयोग मिलता है, तब हम औपचारिक और अनौपचारिक ढंग से उसके प्रति आदर का भाव रखते हैं। छत्तीसगढ़ की खेती-किसानी की परंपरा में आभार का भाव भरपूर दिखाई देता है। यह भाव हमारे अंतःकरण (हृदय) का भाव है। जहाँ भाव होता है, वहाँ आदर और सम्मान होता है। जब हम प्रकृति में भगवान देख सकते हैं, तब जिससे हमारी जीविका चलती है, उसके प्रति आभार का भाव स्वाभाविक है।
आभार क्यों न मानें? भावना ही मूल भाव है। हम जिसे मानते हैं, उसे आलिंगन में भर लेते हैं।
जैसा कि मैंने पहले कहा है, हमारी परंपरा में भावना के साथ-साथ विज्ञान भी छिपा है। यह जानने और समझने की बात है। हमारे पूर्वजों ने जिस परंपरा को बनाया है, उसके अंतःकरण में बहुत-सी बातें रहीं हैं। हम जानते हैं कि हमारी खेती-किसानी के जितने भी औजार हैं, वे या तो लकड़ी के हैं या फिर लोहे के। यदि हम इन्हें समय पर धोकर और पोंछकर नहीं रखेंगे, तो ये खराब हो जाएँगे। लकड़ी सड़ जाएगी और लोहे में जंग लग जाएगा। इस बात को हमारे पूर्वज बहुत अच्छी तरह समझते थे। इसी कारण हरेली त्योहार के दिन खेती-किसानी के सभी औजारों को धो-पोंछकर रखा जाता है, ताकि वे सुरक्षित रहें।
इसके अतिरिक्त गाय और अन्य पशुओं को नहलाकर उन्हें लोंदी खिलाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। यह पशुधन के प्रति सम्मान का भाव है। साथ ही घरों और खेतों में सुरक्षा और अच्छी फसल के लिए नीम और भेलवा पेड़ की टहनियाँ लगाई जाती हैं तथा मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियाँ रखी जाती हैं। हम जानतै हैं कि नीम कीट नाशक है।
घरों में माताओं द्वारा इस दिन चावल आटा और गुड़ का चीला और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं जिनका भोग देवी-देवताओं को लगाया जाता है।
हरेली के दिन युवा और बच्चे बाँस से बनी ‘गेड़ी’ पर चढ़कर चलते हैं और खेल खेलते हैं, जो इस पर्व का विशेष आकर्षण है।
इसी तरह यदि हम अपने अन्य पर्व-परंपराओं को विश्लेषण करें, तो उनमें अलग-अलग भावनाएँ दिखाई देती हैं। और हम अपने पर्वों के लोक-भावना और ज्ञान को समझ सकते हैं। लोक-ज्ञान, विज्ञान से जुड़ा होता है। केवल उसमें अंधविश्वास नहीं होता, आज का पढ़ा-लिखा समाज लोक-ज्ञान की उपेक्षा करता जा रहा है। हमें लोक-ज्ञान को सहेजने की आवश्यकता है और आने वाली पीढ़ी को इसका महत्व बताने की जरूरत है। लोक-ज्ञान और लोक-साहित्य को जब तक सही ढंग से नहीं समझेंगे, अपने राज्य की संस्कृति को सही ढंग से नहीं जान सकते। संस्कृति को जानकर ही उसका संरक्षण किया जा सकता है। आज जिस प्रकार से पर्व, परंपरा और संस्कृति के तत्व खोते जा रहे हैं, वह चिंता का विषय है। संस्कृति किसी भी देश और समाज की पहचान होती है। इस विषय में सोचने और समझने की जरूरत है।
• लेखक संपर्क-
• 94076 50458
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