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कोच्चि में भारतीय सांस्कृतिक कांग्रेस के कुछ पहलू – मालिनी भट्टाचार्य

8 months ago
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आज पूरे भारत में धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील सांस्कृतिक कार्यकर्ता अलगाव की भावना से जूझ रहे हैं। पहले प्रगतिशील लेखक एवं कलाकार संघ तथा आईपीटीए (इप्टा) जैसे अखिल भारतीय संगठन थे, जिन्होंने कुछ हद तक एक ऐसा मंच दिया था, जहाँ ऐसे सांस्कृतिक कार्यकर्ता एक साथ आ सकते थे और अपनी रचनात्मक गतिविधियों के बदलते संदर्भ पर अपने विचार साझा कर सकते थे। जब ये संगठन अखिल भारतीय स्तर पर खत्म हो गए, तो साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा जैसे कुछ सरकारी सहायता प्राप्त, लेकिन स्वायत्त निकायों ने कम से कम आंशिक रूप से हमारे देश में सांस्कृतिक गतिविधियों की भारी विविधता को एक साथ आने का मौका दिया, जिससे कार्यकर्ताओं में जुड़ाव की एक महत्वपूर्ण भावना का संचार हुआ।

लेकिन आज हम बदलाव के एक ऐसे अंधेरे भंवर में फंसते जा रहे हैं, जो आज़ादी की लड़ाई से उभरे प्रगति के विचार को ही खत्म करने की धमकी दे रहा है। भारत की संप्रभुता और संविधान, जो हमें एक साथ जोड़े रखता है, उसी लड़ाई से निकले थे। अब इन दोनों पर हमारे देश में वैश्विक कॉर्पोरेट पूंजी और आरएसएस-भाजपा जैसी सबसे खतरनाक फासीवादी ताकतों के साथ सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर बने गठबंधन द्वारा हमला हो रहा है। आज यही फासीवादी ताकतें केंद्र और कई राज्यों में सरकार और प्रशासन को नियंत्रित कर रही हैं।

सांस्कृतिक क्षेत्र में, इसका मतलब है कि सभी सांस्कृतिक गतिविधियाँ कॉर्पोरेट पूंजी और उसके आधिपत्य वाले मीडिया के दबदबे के तहत ‘संस्कृति उद्योग’ के रूप में विलीन हो जाती हैं। साथ ही, इसका यह भी मतलब है कि उस दबदबे को मज़बूत करने और बनाए रखने के लिए, लोगों के बीच सबसे पिछड़ी और बांटने वाली विचारधारा को आक्रामक तरीके से बढ़ावा दिया जाता है। सार्वजनिक शिक्षा और शोध की नीतियों को कमज़ोर किया जाता है। सांस्कृतिक ‘अकादमियाँ’ खुद अपनी जो भी स्वायत्तता थी, उसे खो देती हैं और सरकार उन पर कब्ज़ा करने की कोशिश करती है। एक तरफ़ आतंक का राज और दूसरी तरफ़ चुप्पी का माहौल — लोगों के बीच सभी रचनात्मक पहलों को खतरे में डाल देता है।

कोच्चि में 20-22 दिसंबर, 2025 को आयोजित इंडियन कल्चरल कांग्रेस, ऐसे सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की ओर से एक शुरुआती कोशिश थी, ताकि वे भौगोलिक दूरी और भाषाई विविधता की बाधाओं को पार करके एक साथ आ सकें और उस हमले का सामना करने और उसका विरोध करने के तरीके ढूंढ सकें, जिसके बारे में वे सभी किसी न किसी रूप में सचेत हैं।

केरल सरकार ने यह सांस्कृतिक महाधिवेशन एक ऐसे समय में आयोजित किया था, जब किसी भी राज्य सरकार के लिए इस परियोजना की अहमियत को स्वीकार करना या उसका अनुमोदन करना मुश्किल हो सकता था। केरल के मुख्यमंत्री ने खुद उद्घाटन सत्र को संबोधित किया और अपने भाषण में संस्कृति के महत्व और हमारी ताकत मानी जाने वाली विविधता को संरक्षित रखने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। ऑल-इंडिया ऑनलाइन कल्चरल न्यूज़लेटर ‘हम देखेंगे’ को इस सांस्कृतिक महाधिवेशन की देखरेख में पहली बार प्रिंट में लाया गया और प्रतिभागियों के बीच वितरित किया गया।

इस कल्चरल कांग्रेस के आयोजन में केरल सरकार की पहल के अलावा कई संगठनों और छात्रों और युवाओं सहित केरल के लोगों और कई स्वयंसेवकों के दिन-रात की मेहनत और कोच्चि के लोगों का मिला-जुला प्रयास शामिल था, जिसके बिना इस सांस्कृतिक महाधिवेशन का आयोजन संभव नहीं हो पाता। कोच्चि बैकवाटर के सामने सुभाष पार्क के बड़े मैदान में, जो किसी भी तरह से सड़कों से अलग नहीं था, यह देखना वाकई एक रोमांचक अनुभव था कि दिन में होने वाले संवाद समूहों और शाम को होने वाले सांस्कृतिक प्रदर्शनों के लिए दर्शकों की कभी कमी नहीं रही। इसमें आज की भारतीय सांस्कृतिक जगत की कुछ जानी-मानी हस्तियां भी शामिल थीं, जिन्होंने संस्कृति के क्षेत्र में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए खुला समर्थन देकर अपनी पहचान बनाई है। आमंत्रितों में से अधिकांश लोग आए और कुछ जो ज़रूरी कारणों से शामिल नहीं हो पाए, उन्होंने महाधिवेशन के मकसद का समर्थन करते हुए अपना संदेश भेजा था।

सादगी भरे और दोस्ताना माहौल, जिसमें आयोजकों और प्रतिभागियों दोनों का योगदान था, ने एक ऐसे वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र की पृष्ठभूमि तैयार की, जिसे वे सभी मिलकर, पैसे और हिंसा पर आधारित मौजूदा सांस्कृतिक व्यवस्था के विरोध में, ढूंढ रहे थे।

अलग-अलग जगहों पर जो प्रस्तुतियां हुई, चाहे वह तेलंगाना का बाबासाहेब अंबेडकर पर नाटक हो, या जनम का महिलाओं के काम पर प्रस्तुति हो, या हरियाणा ग्रुप द्वारा मुक्तिबोध की कविता पाठ की प्रस्तुति हो — वे सभी कॉर्पोरेट मीडिया के चंगुल में फंसे लोगों के बड़े तबकों तक पहुंचने के लिए नए तरीकों के साथ प्रयोग कर रहे थे। इसी समस्या को संवाद समूहों में शामिल लोगों ने भी उठाया, जैसे कि एक समूह में तमिलनाडु के युवा फिल्म निर्माताओं ने बताया कि वे गंभीर फिल्में बनाने में फाइनेंसरों की कमी की बाधा को दूर करने की कैसे कोशिश कर रहे हैं। एक दूसरे समूह में विश्व बाजार द्वारा लोक और आदिवासी संस्कृति को निगलने का मुकाबला करने और इसके मेहनती प्राथमिक उत्पादकों के अलगाव में पड़ने से लड़ने की ज़रूरत पर भी चर्चा हुई।

सभी संवाद समूहों में चर्चा किए गए मामले को एक अकेले व्यक्ति के लिए समेटना मुश्किल होता, यदि समूहों में मुख्य चर्चा करने वालों की प्रस्तुतियों के बाद नीचे बैठे लोग उत्साह से अपने विचार न रखते। यह कोई भी देख सकता था कि कई भाषाओं वाले जमावड़े में होने वाली स्वाभाविक दिक्कतों के बावजूद लोग सवाल पूछने और अपने विचार व्यक्त करने के लिए उत्सुक थे।

लेखक की आज की दुविधा, थिएटर के ज़रिए विरोध, संगीत और नृत्य में परंपरा और आधुनिकता, संचार और वर्चस्व के साधन के रूप में भाषा, मीडिया, राज्य और समाज, विज्ञान और मिथक जैसे विषय संवाद के विषय थे। ऐसे विषयों ने सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को संकट की स्थिति में अपनी भूमिका के लिए आत्मालोचनात्मक नज़रिया अपनाने के लिए एक मंच प्रदान किया। हालांकि सभी इस बात पर सहमत थे कि संस्कृति बुरे दौर से गुज़र रही है, लेकिन इस संवाद से कुछ उम्मीद भी जगी।

मैं यहाँ यह समझाने की कोशिश करूँगी कि इस उम्मीद का स्वरूप क्या था और यह भी बताऊंगी कि इस बारे में साझा चिंता कितनी थी कि इस उम्मीद को एक साझा संकल्प में कितना बदला जा सकता है।

सांस्कृतिक महाधिवेशन ने अपने आखिरी दिन सर्वसम्मति से एक घोषणापत्र अपनाया। प्रोफेसर गणेश नारायण डेवी ने यह भी प्रस्ताव दिया कि अगला सांस्कृतिक महाधिवेशन कर्नाटक के धारवाड़ में हो। इस तरह एक समय सीमा का निर्धारण किया गया और इस समय के अंदर क्या करना है, इसके लिए कुछ बुनियादी सिद्धांतों पर सहमति बनी।

घोषणापत्र में चार सिद्धांतों की बात की गई है, जिन्हें सांस्कृतिक महाधिवेशन में मौजूद सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने अपने काम के साझा आधार के रूप में पहचाना है : धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत, शांति का सिद्धांत, स्वतंत्रता का सिद्धांत और सम्मान का सिद्धांत।

शायद अलग-अलग राजनीतिक विचारों के साथ इस सांस्कृतिक महाधिवेशन में अलग-अलग भाषाओं और कला समुदायों के लोगों का एक साथ आना, इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर संभव हुआ है। अगर ऐसा है, तो हमें यह भी मानना होगा कि इस जमावड़े की आम ‘राजनीति’ यह संकल्प है कि अपने-अपने राज्यों में समान विचारों वाले दूसरे सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को भी एक ही मंच पर लाया जाए। साथ ही, इस ‘राजनीति’ का दूसरा पहलू यह है कि ज़मीनी स्तर पर इन चार सिद्धांतों के लिए सबसे बड़े खतरे की पहचान की जाए और उसका मुकाबला किया जाए, यानी आरएसएस-भाजपा का वैश्विक कॉर्पोरेट्स के साथ गठबंधन और भारत के लोगों पर अपने संयुक्त प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की योजनाओं का मुकाबला करना।

इस संघर्ष का सांस्कृतिक पहलू इसलिए भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बुरी ताक़त हमारे अंदर के विरोधाभासों को भड़काकर, हमारे सामाजिक-राजनीतिक इतिहास का हिस्सा रहे झगड़ों, अनिश्चितताओं और कमजोरियों को हवा देकर अपनी ताक़त बढ़ाती है।

हमारे दुश्मन नफ़रत और बंटवारे का अपना अभियान लोगों के दिमाग में इतनी गहराई तक ले जाने में कामयाब हो गए हैं कि आज हमें एक ‘पोजीशन की लड़ाई’ लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिसमें हम आज़ादी की लड़ाई से मिली अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह से बर्बाद होने से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसे सांस्कृतिक स्तर पर ‘दांव-पेंच की लड़ाई’ में बदलना होगा, जिससे हम सांस्कृतिक विकल्पों के साथ आगे बढ़ सकें। यही वह काम है, जो हमने अपने लिए तय किया है। क्या हम इस चुनौती का सामना कर पाएंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन यही वह उम्मीद है जो इस सांस्कृतिक महाधिवेशन ने हममें जगाई है।

इस सांस्कृतिक महाधिवेशन में दो बहुत ही जाने-माने प्रतिभागियों के विचारों से ऐसी उम्मीद की वजह साफ़ होती है। सईद अख्तर मिर्जा ने कहा कि अपनी आखिरी फिल्म ‘नसीम’ बनाने के बाद, जो बाबरी मस्जिद के विध्वंस को दिखाती है, उन्हें लगा था कि सब कुछ खत्म हो गया है ; लेकिन उसके बाद, वह पूरे भारत में घूमने लगे और हर जगह आम मेहनतकश लोगों से मिले और बातचीत की। इससे उनके मन में अपने जन्मभूमि के प्रति विश्वास वापस आया। इसी तरह, गणेश डेवी ने आज हम पर हावी हो रही हिंसात्मक भाषा के बारे में गंभीर चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसा प्रभुत्व पहले भी हुआ है, लेकिन भारत के लोग हमेशा इससे बच निकलने और मजबूत होकर उभरने में कामयाब रहे हैं। इस बार भी वे ऐसा ही करेंगे।

[ • लेखिका मालिनी भट्टाचार्य लोकसभा की पूर्व सदस्य, प्रख्यात संस्कृतिकर्मी तथा महिला आंदोलन की जानी-पहचानी नेत्री हैं. • इस रिपोर्ट का अनुवाद संजय पराते ने किया है. संजय पराते ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ से संबद्ध ‘छत्तीसगढ़ किसान सभा’ के उपाध्यक्ष हैं. ]

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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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धमतरी आसपास

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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन