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लेख : साधारण से असाधारण की ओर- डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’

• डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’
[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’ का जन्म 12 मई,1956 को हुआ. इनकी अर्धांगिनी शशि प्रभा भी लेखिका, कवयित्री हैं. ये 1978 से छत्तीसगढ़ के प्रथम उद्योग कोरोगेटेड पैंकिंग कार्टन निर्माता विजय इंडस्ट्रीज दुर्ग उद्योगपति हैं. • डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’ विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं से जुड़े हैं. विगत 3 वर्षों से JCI SMA के सदस्य हैं. अनेक विषयों पर अनेक संस्था,समाज एवं समूह को 200 से अधिक व्यक्तित्व विकास सेमिनार में फैकल्टी के रूप में प्रशिक्षण दिया.
• डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’ को उनके रचनात्मक एवं समाज में उल्लेखनीय कार्यों के लिए अनेकों बार सम्मानित भी किया गया. आपकी प्रमुख काव्य कृति है- ‘करवट लेता समय’/’वक़्त दरकता है’/’वक़्त के व्यक्तत्व’/ ‘समय ताल से पग धरना’/’वक़्त डगर से’/’मेरी दुबई यात्रा’/’छंद कथा-समय यथा’/’सृजन पल का काव्य कुंड’ और लगभग 600 काव्य रचना, 1000 दोहे, 250 मुक्तक, 50 कुंडलियां, घनाक्षरी छंद, मुक्तामणि छंद, ताटंक छंद में सृजन कार्य निरंतर जारी है. ]
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साधारण से असाधारण की ओर

जीवन में साधारण मनुष्य बनना कितना सहज सरल होता है। यथोचित व्यवस्था के अनुरूप स्वयं को कर्म दायित्व में ढालते रहना किसी की सहज प्रवृत्ति होती है। अपनी क्षमता से अधिक होने पर ऐसा कर्म कभी संभव न भी हो, तब भी ये होना चाहिए कि हाथ पर हाथ रखकर योजनाओं को भाग्य भरोसे छोड़ दिया जाए। निश्चित रूप से आपके सहज व्यवहार, उचित संबंधों के दायरे में रखते हुए व्यवस्थाओं को जुटाने का काम असाधारण दिखाई देता है। यदि समय की महत्ता दिल दिमाग में, रक्त प्रवाह में प्रवाहित है, फिर किसी भी प्रकार का सहयोग यथा समय वादा अनुसार अमल में लाना इस युग में मनुष्य का जीवन यापन अनिवार्य हिस्सा बन सके, तब स्थितियां असाधारण कहलाती है। हरेक व्यक्ति हर कार्य करने में सक्षम नहीं होता, निर्माण करने का वातावरण भी नहीं रख पाता तभी तो आयात निर्यात की व्यवस्था से वैश्विक विस्तार की व्यवस्था, व्यापार व्यवस्था, घर परिवारों की सद्भावना जुड़ी हुई है।
जितना सुंदर स्वस्थ विचारों की मनोदशा होगी, समयबद्धता का मूल्यांकन होगा, वह देश स्वतः ही अपनी छवि विश्व पटल पर बनाता जाएगा। उक्त विचारों से मेरा तात्पर्य सिर्फ यह है, कि साधारण से साधारण मनुष्य सहज सरल प्रवृत्ति एवं समयानुकूल सहयोग के उपयुक्त रिवाज से स्वयं को, कभी समाज को, और कभी राष्ट्र को लाभान्वित करे, तो वहीं असाधारण शब्द सुनहरे अक्षरों से सम्मानित होने लगता है। व्यक्ति स्वयं का भी संज्ञान नहीं लेता कि वो असाधारण कहलाने लगा है। जब तक कोई अन्य इस दशा दिशा पर मुहर न लगाए, तब तक व्यक्ति साधारण ही कहलाएगा।
साधारण से असाधारण की यात्रा के मध्य संघर्ष, चुनौती, क्रिएटिविटी, मानव मूल्य के प्रति संजीदगी, संवेदना, त्वरित सहयोग का आकांक्षी बनना, नीतिगत सिद्धांतों का मर्यादा में रहकर प्रतिपालन, खुद के हित से बढ़कर परिवार, समाज, देश हित की कटिबद्धता, संस्कृति संस्कारों के प्रति आस्थावान रहते हुए नव पीढ़ी में चैतन्यता जैसे अनेक कार्यबिंदु विचारों के रूप में अकस्मात नहीं आते। वरन विचारों और भावनाओं का आवागमन दिल दिमाग में सदैव वास करता है।
जैसे उपवन में हजारों रंगबिरंगी तितलियां हों, और आप उन्हें गिरफ्त में लेना चाहें, वे उड़ जाती हैं। परंतु हृदय स्मृति में तितलियों की छटा निहित रहती है, तितलियों की मोहक सुंदरता, यत्र तत्र उड़ना, बाग को और भी रमणीक बनाना दिमाग में पलता भी है। इस मार्फत हम अपने विषय संदर्भ को पुनः अगले पड़ाव पर लाते हैं। जीवित और मृत शरीर में सबसे बड़ा अंतर है, कि साधारण जीवित व्यक्ति विचारों से घिरा रहता है। मृत व्यक्ति विचार शून्य हो जाता है। जीवित मनुष्य किसी भी विचार अथवा भाव से ग्रस्त होता है। उन विचारों को गतिमान करने निज प्रयास मार्ग से सफल अथवा असफल भी होता है। उसका कर्म दायित्व, प्रयास, संबंध, व्यवहार गली से समय की टिक टिक सहित गुजरता रहता है। इन स्थितियों में मनुष्य स्वयं से अनजान रहता है, कि वो साधारण से असाधारण की तरफ प्रवृत्त हो रहा है, या असाधारण व्यक्तित्व का मालिक होने पर भी साधारण मनुष्यों जैसा गुजर बसर करने अग्रसर है।
ऊपर उठना याने व्यक्तित्व को ऊंचा उठाना। शरीर के वजन से व्यक्तित्व और नेतृत्व को नहीं तौला जाता। उसके विचार, कर्म, दायित्व, प्रयास, संघर्ष, चुनौती, समन्वय मार्ग से गुजरकर सफल होना ही व्यक्तित्व निर्माण होता है। अतएव साधारण से असाधारण मार्ग में परिवार,समाज, देश में पहचान बनाना असाधारण प्रक्रिया का द्योतक है। एक वैज्ञानिक प्रयोग को समक्ष रखते हैं। किसी खास प्रयोजन से हवा के ज्यादा दबाव को कम किया जाता है। कभी दबाव बढ़ा दिया जाता है। यथा जरूरत के अनुसार कार्यों को करने के लिए ऐसा करना जरूरी होता है। इसी तरह जल के दबाव को भी कम ज्यादा करना होता है। कहीं बांध बनाकर पानी रोका जाता है, कहीं बांध के द्वार खोलकर सुरक्षा देना होता है।
बस इसी तरह हर साधारण व्यक्ति के दिल दिमाग में भावनाओं का ज्वार पनपता है। कभी तो ऐसे शब्द विचार भावों को महत्व मिल पता है, अथवा कभी अतिरेक विचार वजह से खास विचारों को भूलता भी रहता है। ट्रेन में यात्रा करता हुआ व्यक्ति कितने लोगों को देखता है पर कितनों को याद रख पाता है, इस उदाहरण से स्पष्ट है, कि सारे विचार भावों को याद रख पाना संभव नहीं होता। फिर संभव क्या है?
विशेष विचार की अभिव्यक्ति को कहीं संग्रहित किया जाए। फिर उस विचार के अमलीकरण हेतु कुछ सूत्र सिद्धांत भी बनाए जाएं। सही विश्लेषण उपरांत क्रियान्वयन प्रारंभ किया जाए। तब आपके व्यवहार की बुनियाद, आपके रिश्तों की डोर, आपकी कार्यशैली की दक्षता, क्षमता, समत्व, ममत्व स्पर्श आपको असाधारण मार्ग में प्रविष्ट करा देती है।
महान कवि सुमित्रानंदन पंत की एक कविता प्रेरणा देती है। कविता का नाम है “मैने छिपकर जमीन में कुछ पैसे बोए थे”। इस कविता में संदेश है कि पैसे का झाड़ उगाने की लालसा में जमीन में रोपा हुआ पैसा कुछ काम नहीं आया। पैसे का कोई झाड़ नहीं ऊगा। परंतु विचार ने करवट बदला और दोबारा प्रयास किया। अब की बार सेम के बीज बो दिए। कुछ दिन बाद सेम की कलियां, फलियां और पत्तों ने जमीन को हरियाली से भर दिया। जिसे बेचकर बहुत से पैसे भी आए। जैसा बोया जाएगा, वैसा उत्पाद आपको प्राप्त होगा।
सिर्फ अपना हित ध्यान न रखते हुए जो विचार अन्य के हित में प्रवृत्त रहें, तब ऐसे विचारों का सन्मार्ग फलीभूत होगा, परंतु क्रियान्वयन समन्वय सहयोग भाव में सामंजस्यता भी स्थापित रहे। डॉ अब्दुल कलाम, लाल बहादुर शास्त्री, महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद सरस्वती, लौह पुरुष वल्लभ भाई पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे अनेक विभूतियों ने राष्ट्र के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया। हम ऐसे सभी महापुरुषों, कवियों, लेखकों, दार्शनिकों साहित्यकारों को साधारण से असाधारण की ओर वाली जीवन यात्रा के नाम से गर्वित होते हैं। प्रेरित होते हैं।
प्रत्येक साधारण मनुष्य में क्षमता दक्षता निहित है। स्वार्थ का त्याग करते हुए अनुशासन और सिद्धांतों पर चलकर, उचित समा के मुताबिक जनमानस हितार्थ सारे सेवा कार्य वंदनीय हैं। कवि प्रदीप का भी भजन है, “दूसरों का दुखड़ा दूर करने वाले तेरे दुख दूर करेंगे राम।
किए जा तू जग में भलाई का काम तेरे दुख दूर करेंगे राम”। साहित्य, सेवा, सृजन में सतत अपने व्यक्तित्व को व्यवसायिक कार्य में लिप्त रहते हुए भी अर्पित करने का उपक्रम निश्चित ही असाधारण कृत्य होता है। अनुकरणीय होता है, वंदनीय होता है।
• लेखक संपर्क-
• 85168 62721
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