- Home
- Chhattisgarh
- विश्व स्वास्थ्य दिवस [7 अप्रैल, 2026] पर विशेष लेख : ‘मिलावट के दौर में शुद्ध जीवन की खोज’- कैलाश जैन बरमेचा
विश्व स्वास्थ्य दिवस [7 अप्रैल, 2026] पर विशेष लेख : ‘मिलावट के दौर में शुद्ध जीवन की खोज’- कैलाश जैन बरमेचा

👉 • ‘दूध’ बचपन से हमारे पूर्ण आहार में माना गया है लेकिन आज सबसे अधिक संदेह के घेरे में है ‘दूध’?
हर वर्ष 7 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व स्वास्थ्य दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम वास्तव में कितने स्वस्थ हैं और जिस दिशा में हमारा जीवन आगे बढ़ रहा है, वह हमें स्वास्थ्य की ओर ले जा रहा है या बीमारी की ओर। आधुनिक जीवनशैली ने हमें सुविधा तो बहुत दी है, लेकिन इन सुविधाओं की कीमत कहीं न कहीं हमारे स्वास्थ्य से ही वसूली जा रही है। आज का मनुष्य बाहर से जितना सुसज्जित और व्यवस्थित दिखाई देता है, भीतर से उतना ही कमजोर और असुरक्षित होता जा रहा है।
हमारे जीवन का सबसे मूल आधार भोजन है और उसी भोजन में जब मिलावट घुल जाती है, तो स्वास्थ्य अपने आप कमजोर पड़ने लगता है। विशेष रूप से दूध, जिसे हम बचपन से ही पूर्ण आहार मानते आए हैं, आज सबसे अधिक संदेह के घेरे में है। घर-घर में सुबह की शुरुआत चाय से होती है, बच्चों को दूध दिया जाता है, बुजुर्गों को ताकत के लिए दूध आवश्यक माना जाता है, लेकिन शायद ही कोई यह सोचता हो कि जो दूध हम पी रहे हैं, वह वास्तव में कितना शुद्ध है। यदि हम गंभीरता से विचार करें तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या वास्तव में गाय और भैंस इतनी मात्रा में दूध दे सकती हैं कि पूरे देश की इतनी बड़ी आबादी की आवश्यकता पूरी हो सके। वास्तविकता यह है कि प्राकृतिक उत्पादन और बाजार की मांग के बीच बहुत बड़ा अंतर है, और इसी अंतर को भरने के लिए कृत्रिम तरीकों का सहारा लिया जा रहा है।
आज कई स्थानों पर ऐसे तथाकथित दूध का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें न तो गाय का स्पर्श होता है और न ही प्रकृति की कोई भूमिका। रासायनिक पदार्थों, पाउडर, डिटर्जेंट और अन्य हानिकारक तत्वों के मिश्रण से तैयार किया गया यह दूध देखने में भले ही असली लगे, लेकिन शरीर के लिए धीरे-धीरे जहर का काम करता है। यह स्थिति केवल दूध तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग हर खाद्य पदार्थ किसी न किसी रूप में मिलावट का शिकार हो चुका है। फल, सब्जियां, अनाज—सब कुछ अधिक उत्पादन और अधिक लाभ की होड़ में अपनी प्राकृतिक शुद्धता खोते जा रहे हैं।
इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर दिखाई दे रहा है। छोटे-छोटे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले की तुलना में कम हो गई है, युवाओं में असामान्य थकान और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, और बुजुर्गों के लिए तो यह मिलावटी भोजन कई गंभीर बीमारियों का कारण बनता जा रहा है। अस्पतालों की बढ़ती भीड़ और दवाइयों पर निर्भरता इस बात का प्रमाण है कि हम सुविधा के पीछे भागते-भागते अपने स्वास्थ्य से दूर होते जा रहे हैं।
ऐसे समय में यह आवश्यक हो जाता है कि हम केवल समस्या की चर्चा तक सीमित न रहें, बल्कि समाधान की दिशा में भी गंभीरता से सोचें। यदि हम अपने जीवन में शुद्धता वापस लाना चाहते हैं, तो हमें प्रकृति के करीब लौटना होगा। पहले के समय में लगभग हर घर में एक गाय या भैंस हुआ करती थी, जिससे परिवार को शुद्ध दूध प्राप्त होता था और साथ ही एक आत्मनिर्भर जीवनशैली भी विकसित होती थी। आज भले ही शहरी जीवन में यह व्यवस्था कठिन प्रतीत होती हो, लेकिन असंभव नहीं है।
यदि नगर नियोजन में थोड़े से बदलाव किए जाएं और मकानों के नक्शे पास करते समय पशु रखने के लिए स्थान को अनिवार्य कर दिया जाए, तो यह न केवल परंपरा को पुनर्जीवित करेगा बल्कि लोगों को शुद्ध दूध प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी करेगा। जब व्यक्ति स्वयं अपने घर में गाय का पालन करेगा, तो वह केवल दूध ही नहीं पाएगा, बल्कि प्रकृति के साथ उसका एक भावनात्मक संबंध भी स्थापित होगा, जो मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इसके साथ ही, हमें अपनी जीवनशैली में भी बदलाव लाना होगा। अत्यधिक प्रोसेस्ड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर निर्भरता कम करनी होगी और स्थानीय, ताजा और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को अपनाना होगा। योग, प्राणायाम और नियमित व्यायाम को केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता के रूप में स्वीकार करना होगा। स्वास्थ्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जा सके, यह तो हमारी दिनचर्या और हमारे चुनावों का परिणाम होता है।
धीरे-धीरे समाज में जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन अभी भी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। जब तक हर व्यक्ति अपने स्तर पर शुद्धता को प्राथमिकता नहीं देगा, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। यह केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
विश्व स्वास्थ्य दिवस का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब हम इस दिन को केवल एक औपचारिकता के रूप में न मनाकर, अपने जीवन में एक नए संकल्प के रूप में स्वीकार करें। यह संकल्प शुद्ध भोजन का हो, शुद्ध विचारों का हो और एक ऐसी जीवनशैली का हो, जो हमें फिर से प्रकृति के करीब ले जाए, क्योंकि अंततः वही जीवन सबसे सुंदर और सबसे स्वस्थ होता है, जो कृत्रिमता से दूर और सादगी के निकट होता है।

👉 • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा लेखन में निरंतर सक्रिय हैं और लगातार विभिन्न विषयों पर लिखते हुए समाज में नई दिशा दे रहे हैं. • कैलाश जैन बरमेचा साहित्य के अलावा पत्रकारिता से भी जुड़े हैं. ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)