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राहुल गाँधी केरल में क्या कर रहे हैं : प्रतिद्वंद्विता या आत्म हत्या- आलेख त्रिभुवन

6 months ago
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क्या केरल के कम्युनिस्ट राहुल गांधी के हालिया भाषणों को सचमुच सुन रहे हैं? अगर सुन रहे हैं तो उन्हें यह भी नोट करना चाहिए कि यह केवल चुनावी उत्तेजना का क्षणिक शोर नहीं ; यह उस राष्ट्रीय नेता की भाषा है, जो केरल विधानसभा चुनाव के बीच फोर्ट कोच्चि से लेकर कोयिलांडी, कन्नूर, कल्लाची और फिर अलप्पुझा तक एक ही आरोप को अलग-अलग शब्दों में दुहराते हुए एलडीएफ को भाजपा-आरएसएस का साझीदार, सहचालक, छिपा हुआ सहयोगी, यहां तक कि वैचारिक रूप से रिक्त हो चुका मोर्चा घोषित कर रहा है।

कभी वह कहते हैं कि यूडीएफ की लड़ाई केवल एलडीएफ से नहीं, ‘एलडीएफ-बीजेपी पार्टनरशिप’ से है ; कभी ‘लेफ्ट में अब कुछ भी लेफ्ट नहीं बचा’ ; कभी एलडीएफ को ‘सीजेपी’ यानी कम्युनिस्ट जनता पार्टी जैसी तंज़भरी संज्ञा देते हैं और कभी आरोप लगाते हैं कि केरल में ‘एक छिपा हुआ हाथ’ एलडीएफ को चला रहा है। एक ऐसा हाथ, जो सांप्रदायिक है, संविधान को नहीं मानता, समाज को बांटता है और नफ़रत फैलाता है। यह कहते हुए वे यह भूल जाते हैं कि ‘हाथ’ उनका अपना चुनाव चिह्न है।

वह यहां तक कहते हैं कि केरल में हर कोई भाजपा, आरएसएस और सीपीआई (एम) के बीच का रिश्ता देख सकता है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन उन ताक़तों के साथ मिले हुए हैं, जो अल्पसंख्यकों — मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों — पर हमला करती हैं। एलडीएफ के भीतर अब दो ही किस्म के लोग बचे हैं। एक वे अवसरवादी, जो सत्ता के लिए भाजपा-आरएसएस की मदद लेते हैं और दूसरे वे पुराने कार्यकर्ता, जो अपनी ही विचारधारा से धोखा खा चुके हैं।

यहां तक भी बात रुकती नहीं। राहुल गांधी इस रेखा को और बड़ा करते हुए कहते हैं, दो सबूत हैं, जिनसे एलडीएफ-भाजपा समझौता सिद्ध होता है। पहला यह कि उनके (राहुल गांधी के) ख़िलाफ़ 36 से 40 मुक़दमे हैं, प्रवर्तन निदेशालय ने उनसे पांच दिन पूछताछ की, लेकिन केरल के मुख्यमंत्री और उनके बच्चों पर केंद्रीय एजेंसियां निष्क्रिय क्यों हैं? दूसरा, सबरीमला मंदिर से सोना चोरी कर पीतल रख देने के कथित मामले पर प्रधानमंत्री की चुप्पी।

उनके शब्दों में, मोदी बोलते क्यों नहीं, अगर वे सचमुच एलडीएफ के ख़िलाफ़ हैं? राहुल ने यह भी कहा कि मोदी एलडीएफ को जीताना चाहते हैं, क्योंकि एलडीएफ कभी भी राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें उस तरह चुनौती नहीं दे सकता, जिस तरह कांग्रेस और यूडीएफ दे सकते हैं। और फिर उन्होंने इस पूरी दलील को एक चुनावी व्यंग्य-वाक्य में समेट दिया : अगर मोदी कहें कूदो, तो मुख्यमंत्री कूदेंगे, कहें लेट जाओ, तो लेट जाएंगे, कहें अडानी को कुछ दो, तो दे देंगे। इस भाषा में केवल आक्रोश नहीं है ; इसमें राजनीतिक अविश्वास को स्थायी सिद्धांत में बदल देने की बेचैनी है।

यहीं, राहुल गांधी की राजनीतिक समस्या शुरू होती है।

विपक्षी राजनीति को नुकसान

केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल प्रतिद्वंद्वी हैं. यह कोई नई बात नहीं, न ही इसमें कोई पाप है। केरल की राजनीति दशकों से इसी द्विध्रुवीयता पर खड़ी रही है, जहां यूडीएफ और एलडीएफ एक-दूसरे से सत्ता छीनते रहे हैं। लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी अब केवल वायनाड या केरल के प्रचारक नहीं हैं ; वे राष्ट्रीय विपक्ष की एक केंद्रीय आवाज़ हैं। उनकी ज़बान अब केवल एक राज्य की चुनावी ज़रूरत की चीज़ नहीं रह गई ; वह पूरे विपक्षी मानस की दिशा भी तय करती है। इसलिए जब वे स्थानीय चुनावी लाभ के लिए वामपंथ और संघ परिवार के बीच की दूरी ही मिटाने लगते हैं, तो वे केवल एलडीएफ पर हमला नहीं करते ; वे विपक्षी राजनीति के पूरे व्याकरण को छेद देते हैं।

वे यह नहीं कह रहे कि एलडीएफ भ्रष्ट है, प्रशासनिक रूप से जड़ है, अवसरवादी है या अपने मूल वैचारिक वादों से पीछे हट गया है, जो कि एक वैध और तीखी आलोचना हो सकती थी। वे यह कह रहे हैं कि एलडीएफ वस्तुतः उसी दक्षिणपंथी-सांप्रदायिक परियोजना का सहायक उपकरण है, जिसके ख़िलाफ़ देश के स्तर पर कांग्रेस स्वयं एक व्यापक मोर्चा बनाना चाहती रही है। यही वह बिंदु है, जहां चुनावी वाक्पटुता का अभाव रणनीतिक अल्पदृष्टि में बदल जाती है।

यही कारण है कि सीपीआई(एम) के शीर्ष नेतृत्व की तरफ़ से यह कहा गया कि इंडिया ब्लॉक के राष्ट्रीय नेताओं को स्थानीय दबाव में आकर ऐसे राज्यीय टकरावों को इस तरह नहीं गढ़ना चाहिए कि राष्ट्रीय एकता ही क्षतिग्रस्त हो जाए।

यह एक तरह से राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और आरएसएस की सीधी मदद करने वाली राह है. यह आपत्ति केवल संगठनात्मक शिष्टाचार की नहीं थी ; वह विपक्षी राजनीति के दीर्घकालीन स्वार्थ की आपत्ति थी, क्योंकि अगर राष्ट्रीय स्तर पर आप संविधान, संस्थाओं, संघीय ढांचे और लोकतंत्र की रक्षा के लिए साथ खड़े हैं, तो राज्य स्तर पर आपसी लड़ाई की भाषा में भी एक न्यूनतम वैचारिक विवेक होना चाहिए.

प्रतिद्वंद्वी को दुश्मन कहना राजनीति है ; प्रतिद्वंद्वी को उसी परियोजना का हिस्सा कहना, जिससे आप स्वयं देश को बचाने का दावा कर रहे हैं, आत्मघात है।

रणनीतिक परिपक्वता नहीं

एक विवेकशील विश्लेषक की यथार्थपरक नज़र से देखें तो राहुल गांधी की यह भाषा रणनीतिक परिपक्वता नहीं, रणनीतिक बालसुलभता है। फ़ासीवादी या अर्ध-फ़ासीवादी राजनीति से लड़ने का पहला नियम यह होता है कि आप अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी और अपने गौण प्रतिद्वंद्वी के बीच फ़र्क बनाए रखें।

आप अपने वैचारिक सहयोगी-प्रतिद्वंद्वी से कठोर लड़ाई लड़ सकते हैं, उसकी सरकार की आलोचना कर सकते हैं, उसके भ्रष्टाचार, नौकरशाही, संगठनात्मक जड़ता, सत्ता-लोलुपता और वैचारिक खोखलेपन पर प्रहार कर सकते हैं ; लेकिन यदि आप उसे उसी सांचे में ढाल दें जिसमें आरएसएस और भाजपा को ढालते हैं, तो आप विश्लेषण नहीं कर रहे होते ; आप चुनावी रंगमंच कर रहे होते हैं। और रंगमंच, इतिहास की जगह नहीं ले सकता।

विचारधारा की आलोचना और वैचारिक समूल-विलयन में फ़र्क होता है। राहुल गांधी इस फ़र्क को मिटा रहे हैं।

भारतीय राजनीति का इतिहास खुद राहुल गांधी के विरुद्ध गवाही देता है 2004 में कांग्रेस और अन्य दलों ने मिलकर यूपीए बनाया और उसे वामदलों के समर्थन ने भाजपा-नीत एनडीए को सत्ता से बाहर रखने में निर्णायक भूमिका दी। वह साथ केवल सीटों का गणित नहीं था ; वह नेशनल कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जैसे साझा ढांचे पर टिका हुआ एक समझौता था, जिसमें मतभेदों के बावजूद एक व्यापक लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष सहमति की ज़मीन मौजूद थी। वह संभवत: कई दशकों में देश की एक बेहतरीन सरकार थी।

बाद में 2008 में वामदलों ने उसी कांग्रेस-नीत सरकार से समर्थन वापस लिया, क्योंकि उनके अनुसार सरकार उस साझा कार्यक्रम और स्वतंत्र विदेश नीति की प्रतिबद्धताओं से विचलित हो रही थी। यानी इतिहास यह कहता है कि कांग्रेस और वाम के बीच तीखे मतभेद हो सकते हैं, टूट हो सकती है, अविश्वास हो सकता है, संघर्ष हो सकता है ; लेकिन वह संघर्ष वैचारिक धरातल पर होता है, न कि इस बचकाने निष्कर्ष पर कि ‘जो मेरे ख़िलाफ़ है, वह संघ का छिपा हुआ रिश्तेदार है।’

राजनीतिक परिपक्वता का अर्थ यही होता है कि आप मतभेद को विश्वासघात की भाषा में नहीं, विरोधाभास की भाषा में पढ़ें।

लाभ भाजपा को मिलेगा

राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि 2024 के लोकसभा चुनाव ने एक बुनियादी सबक दिया था और वह यह था कि विपक्ष की अपूर्ण, असंगत, टेढ़ी-मेढ़ी, आपसी खीझ और अविश्वास से भरी एकता भी भाजपा को पहली बार एक दशक में अपने दम पर बहुमत से नीचे ला सकी। यह एकता कोई आदर्श लोक नहीं थी ; यह दरारों, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं, परस्पर अविश्वासों, और अनेक असुविधाजनक समझौतों से बनी थी। लेकिन राजनीति में कई बार इतिहास की रक्षा आदर्शों से नहीं, अपूर्ण सहमति से भी होती है।

यदि 2026 में राहुल गांधी स्वयं उसी पुल पर हथौड़ा मारने लगें, जिसे 2023-24 में बड़ी मुश्किल से खड़ा किया गया था, तो वे मोदी के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं, मोदी के लिए भविष्य का एक बंद होता रास्ता खोलने वाला काम कर रहे हैं।

राहुल की यह लाइन मोदी को तीन तरह से लाभ पहुंचाती है। पहला, वह विपक्ष के भीतर अविश्वास का ज़हर घोलती है। दूसरा, वह भाजपा को यह कहने का मौका देती है कि देखिए, ये सब एक-दूसरे को ही हमारा बी-टीम बताते हैं ; असली विकल्प तो हम हैं। और तीसरा, राहुल गांधी की यह बयानबाज़ी वैचारिक संघर्ष को नैतिक सनसनी में बदल देती है, जहां वर्ग, राज्य, पूंजी, सांप्रदायिकता, संघीयता, कल्याण, श्रम, अल्पसंख्यक अधिकार, किसान, मछुआरे, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे वास्तविक प्रश्न पीछे हट जाते हैं, और उनकी जगह आरोपों की एक धुंध ले लेती है.

भाजपा ऐसी ही धुंध में सबसे आसानी से चलती है, क्योंकि धुंध उसका स्वाभाविक मौसम है। जब विपक्ष अपने ही भीतर फ़ासीवाद की नक़ली प्रतिमाएं गढ़ने लगता है, तब असली फ़ासीवाद पीछे बैठकर मुस्कुराता है।

आलोचना में अतिरेक की भाषा

यहां मुद्दा यह नहीं कि एलडीएफ आलोचना से परे है। बिल्कुल नहीं। किसी भी वामपंथी सरकार को उसके प्रशासनिक अहंकार, भ्रष्टाचार के आरोपों, राज्यसत्ता के केंद्रीकरण, संगठनात्मक जड़ता, नौकरशाहीकरण और सत्ता-लोलुपता पर कठोरतम प्रश्नों से गुजरना ही चाहिए। उसे यह भी जवाब देना चाहिए कि क्या उसने अपने ऐतिहासिक वैचारिक वादों, जैसे श्रम, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक भागीदारी और धर्मनिरपेक्ष संकल्प को प्रशासनिक सुविधा और चुनावी प्रबंधन के नीचे दबा दिया है।

लेकिन यह आलोचना तब राजनीतिक रूप से उपयोगी होती है जब वह वाम की विफलता को सामने लाए, न कि उसे दक्षिणपंथ की जुड़वां प्रति घोषित कर दे। पहली आलोचना सुधार, धक्का, पुनर्संरचना और वैचारिक पुनरुद्धार की संभावना खोलती है ; दूसरी आलोचना केवल अविश्वास, बदले, दुष्प्रचार और दीर्घकालीन विघटन का दरवाज़ा खोलती है।

राहुल गांधी इस समय केरल में एक ऐसे आदमी की तरह बोल रहे हैं, जो अपने पड़ोसी के घर में आग देखकर यह भूल गया है कि हवा किस दिशा में चल रही है। वह सोचता है कि लपटें सिर्फ़ सामने वाले आंगन को जलाएंगी ; पर सांप्रदायिक राजनीति की आग में दीवारें बहुत देर तक अलग-अलग नहीं रहतीं।

केरल में एलडीएफ को हराने की बेचैनी समझी जा सकती है ; कांग्रेस को अपने कार्यकर्ताओं, समर्थकों और सामाजिक आधार को ऊर्जा देनी है, यह भी समझा जा सकता है ; पर एलडीएफ को आरएसएस के बराबर ठहरा देना राजनीतिक बुद्धिमत्ता नहीं, बौद्धिक उतावलापन है। और उतावले लोग अक्सर इतिहास नहीं बनाते, इतिहास की गलतियां दोहराते हैं।

दरअसल राहुल गांधी के ताज़ा केरल भाषणों में एक गहरी विडंबना छिपी हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर वे स्वयं को संविधान, बहुलता, प्रेम, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की राजनीति का चेहरा बनाना चाहते हैं ; लेकिन केरल में वे ऐसी वाणी बोल रहे हैं जो प्रतिद्वंद्वी और शत्रु, मतभेद और मिलीभगत, आलोचना और अपमान, रणनीति और सनक- इन सबके बीच की रेखाएं मिटा देती है। यह भाषा विपक्षी एकता की नहीं, चुनावी अतिरेक की भाषा है।

यह उस आदमी की भाषा है, जो हर तात्कालिक विजय को ऐतिहासिक विजय मान बैठता है। लेकिन इतिहास हमेशा मतगणना की मेज़ पर नहीं लिखा जाता ; कई बार इतिहास उन पुलों पर लिखा जाता है, जिन्हें आप क्रोध में तोड़ देते हैं और फिर अगली लड़ाई में पार करने के लिए आपके पास कोई रास्ता नहीं बचता।

यही बात कम्युनिस्टों को भी समझनी चाहिए। राहुल गांधी को अपना ‘नया महानायक’ मानने की कोई भी बेचैनी अंततः उसी भाषा को वैध करेगी, जो कल आपके अस्तित्व को ही संदिग्ध बता सकती है।

और यही बात राहुल गांधी को भी समझनी चाहिए कि मोदी, भाजपा और आरएसएस के ख़िलाफ़ कोई भी टिकाऊ मोर्चा अपमान की ईंटों से नहीं, कठिन सहअस्तित्व की गारे से बनता है। उसमें मतभेद होंगे, अविश्वास होगा, कटुता होगी, क्षेत्रीय संघर्ष होंगे, चुनावी टकराव होंगे ; लेकिन फिर भी एक बुनियादी समझ बची रहनी चाहिए कि भारत की राजनीति में असली वैचारिक लड़ाई कहां है।

जो नेता इस साधारण-सी बात को नहीं समझता, वह चुनाव तो लड़ सकता है, नारे भी गढ़ सकता है, सभाओं में तालियां भी बटोर सकता है ; पर इतिहास की लंबी लड़ाई का सेनापति नहीं बन सकता।

• साभार : न्यूजक्लिक

[ • लेखक त्रिभुवन वरिष्ठ पत्रकार हैं ]

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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक
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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक

काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर

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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा

18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन