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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष : केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं- कैलाश जैन बरमेचा

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• जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को पर्यावरण संरक्षण का प्रहरी नहीं मानेगा, तब तक केवल सरकारी योजनाएं या एक दिन के कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे

प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं, शासकीय कार्यालयों और विभिन्न संगठनों द्वारा पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हजारों पौधे लगाए जाते हैं, फोटो खिंचवाए जाते हैं, समाचार पत्रों में समाचार प्रकाशित होते हैं और अगले दिन अधिकांश लोग उन पौधों को भूल जाते हैं। ऐसे में एक गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या केवल एक दिन पौधे लगा देना ही पर्यावरण संरक्षण है?
वास्तव में पर्यावरण दिवस का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना और उनका निरंतर निर्वहन करना है। पौधे लगाना एक अच्छा कार्य है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उन पौधों की देखभाल करना, उन्हें पानी देना, पशुओं से बचाना और उन्हें वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखना। यदि लगाए गए पौधे कुछ ही दिनों में सूख जाएँ तो हमारा प्रयास केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है पहले से मौजूद पेड़ों और जंगलों को बचाना। आज आधुनिकता, औद्योगिकीकरण, नई कॉलोनियों, बाजारों और सड़कों के विस्तार के नाम पर बड़ी संख्या में वृक्ष काटे जा रहे हैं। जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं और हरियाली कम होती जा रही है। जिस गति से वृक्षों का विनाश हो रहा है, उसकी तुलना में नए पौधों का रोपण बहुत कम है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण का पहला संकल्प होना चाहिए कि अनावश्यक रूप से किसी भी पेड़ को न काटा जाए और जो जंगल बचे हैं, उन्हें सुरक्षित रखा जाए।
शहरों के आसपास स्थित गाँवों और खाली स्थानों में लगे घने वृक्ष पूर्ण जंगल तो नहीं होते, परंतु वे एक सुंदर उपवन का कार्य करते हैं। हम भले ही बड़े जंगल न बना सकें, लेकिन अपने मोहल्लों, विद्यालयों, सार्वजनिक स्थलों और घरों के आसपास छोटे-छोटे उपवन और उद्यान तो विकसित कर ही सकते हैं। फलदार, छायादार और औषधीय पौधों का रोपण करके हम पर्यावरण को समृद्ध बना सकते हैं। इससे हमें शुद्ध ऑक्सीजन मिलेगी, फलों का लाभ मिलेगा, गर्मी से राहत मिलेगी और प्रकृति का संतुलन भी बना रहेगा।
वर्तमान समय में बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और मौसम के बदलते स्वरूप मानव के लिए गंभीर चेतावनी हैं। ओजोन परत का असंतुलन और ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं। यदि हम समय रहते नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा। अधिक वृक्षारोपण और हरियाली के संरक्षण से वातावरण का तापमान नियंत्रित होगा, वर्षा चक्र संतुलित रहेगा और पृथ्वी पर जीवन अधिक सुरक्षित रहेगा।
पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षों तक सीमित नहीं है। स्वच्छता, सफाई और प्रदूषण नियंत्रण भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर कचरा न फेंकना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, नालियों को स्वच्छ रखना, जल स्रोतों को प्रदूषित न करना तथा ध्वनि और वायु प्रदूषण को कम करना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। यह कार्य केवल नगर निगम या नगरपालिका का नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है।
जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को पर्यावरण संरक्षण का प्रहरी नहीं मानेगा, तब तक केवल सरकारी योजनाएँ या एक दिन के कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएँगे। हमें अपने जीवन में ऐसे छोटे-छोटे बदलाव लाने होंगे जो प्रकृति के हित में हों। यदि प्रत्येक व्यक्ति एक पौधा लगाए, उसकी देखभाल करे, एक पेड़ कटने से बचाए और अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखे, तो पर्यावरण संरक्षण का अभियान निश्चित रूप से सफल होगा।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे वर्ष प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का संदेश देता है। आइए, हम संकल्प लें कि न तो पेड़ों को कटने देंगे, न ही किसी प्रकार का प्रदूषण फैलाएँगे। हम पर्यावरण को स्वच्छ, सुरक्षित और हराभरा बनाने में अपना योगदान देंगे, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ, सुंदर और जीवनदायी धरती मिल सके। यही विश्व पर्यावरण दिवस की वास्तविक सार्थकता है और यही मानवता के प्रति हमारी सच्ची जिम्मेदारी भी है।
[ • कैलाश जैन बरमेचा प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक हैं. ]
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