■कविता आसपास : ■अमृता मिश्रा ‘निधि’.
5 years ago
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●वापसी
-अमृता मिश्रा ‘निधि’
[ देहली पब्लिक स्कूल, भिलाई ]
न जाने क्यों खाली-खाली सी
लगती है दुनिया
पसरा रहता है
मन के अंदर एक विराट शून्य
यह शून्यता कुछ ऐसी ही,
जैसे बुद्ध के जाने से
यशोधरा के मन रही होगी
अथाह सागर में बिन पतवार
होगी किंचित गहरी निराशा,
अनकही पीर से उभरती एक टीस
टीस अधूरेपन और
विरह से उपजी हुई,
जैसे आकंठ डूबी हो हलाहल में
हलाहल को धारण करना
क्या इतना सरल है?
नीलकण्ठ होना इतना सहज है क्या?
हमें एक नई परिभाषा
गढ़नी ही होगी अब
बुद्ध से पहले यशोधरा बनना होगा
जानती हूँ कि होने लगेगी
फिर कोई मन्त्रणा और
खींची जाएगी नई लक्ष्मण-रेखा
स्त्री के लिए तो पुन:
विरह-अग्नि बनेगी लाँघना
लाँघना संभव नहीं होगा तब
क्योंकि इस पार से उस पार जाना,
मुमकिन कहाँ फिर लौट पाना!
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chhattisgarhaaspaas
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