▶️ कविता आसपास : तारक नाथ चौधुरी.
4 years ago
244
0
▶️ वंदे मातरम सब गायें.
गुमसुम सारे बैठे हैं,
जैसे हारे बैठे हैं।
मनुज हुआ पत्थर जैसा,
उसमें संवेदन कैसा।
हृदय हुआ बंजर धरती
प्रीत-फसल नहीं उगती।
सूखा आँखों का पानी,
दर्द पराया बेमानी।
निज परिधि में गये सिमट,
स्वार्थ जाल में गये लिपट।
घर के भीतर दीवारें
दोष न कोई स्वीकारे।
कहने को भाई-भाई
रहते शत्रु की नाईं।
देशभक्ति खंडित-खंडित,
धर्म का अर्थ हुआ विकृत।
सत्ता का पिस्सू नेता
अपनों का ही लहू लेता।
भाषण में आश्वासन है,
अंतस् में दुःशासन है।
संसद अब रणभूमि लगे,
संविधान के पृष्ठ सिसके।
ऐसा नहीं मेरा भारत,
विश्व-गुरु मेरा भारत।
नव -क्राँति का हो आह्वान,
लौटा दो आहत सम्मान।
वंदे मातरम् सब गाएँ
घर-घर तिरंगा फहराएँ।
•संपर्क –
•83494 08210
🟠🟠🟠🟠🟠🟠🟠🟠🟠🟠
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)