रचना आसपास : किसान और आत्महत्या विपरीत ध्रव – विद्या गुप्ता [दुर्ग छत्तीसगढ़]
किसान और आत्महत्या
विपरीत ध्रुव …..
अपने मृत्युलोक में किसान
जलता, ठिठुरता, टूटता है
टूट कर फिर जुड़ता है
एक बार नहीं कई कई बार
जमीन नहीं
फिर भी जोतता है
दाना नहीं
फिर भी बोता है उधार
पानी की कमी को
पसीने से सीचता है
बैल नहीं तो ,
लगा देता है अपना कांधा
उगाता है फसल
और दे देता है उधारी चुकाने में
जिनकी जमीन है,
जिनका दाना है
खुद संतोष को
दिनचर्या सा ओढ़ कर
चुनने जाता है
फसल कटने के बाद
खेत में गिरे दाने
गिनती की रोटियों को
बांट खा कर आधा पेट
सो जाता है गहरी नींद
कपड़े आधे पहनता है
जो जगह-जगह फटकर
पाव रह जाते हैं सीलकर
गर्मियों में तो ठीक
सर्दियों में जब कम पड़ते हैं
जला लेता है अलाव
पैसे हो तो
दवाई लाता है
पैसे हैं तो तीर्थ कर स्वर्ग जाता है
पैसे नहीं तो कर्ज में पैदा होता
कर्ज में ब्याह जनेऊ मुंडन कर
बेटा बेटी के कंधों पर
कर्जधर मर जाता है
बगैर शिकायत
इससे बढ़कर भी
ऐसा कुछ क्या हुआ कि रोज मर कर जीने वाले किसान ने
कर ली आत्महत्या.
•संपर्क –
•96170 01222
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chhattisgarhaaspaas
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