कविता आसपास : ‘ आईना तू भी! – तारक नाथ चौधुरी [ चरोदा – भिलाई छत्तीसगढ़ ]
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आईना तू भी ❗
बडा़ यकी़न था मुझे
घर के आईने पर
जब भी रुबरू होता
मुझको मेरे ऐब दिखलाता
और मैं सँवरने की कोशिश करता
मगर जबसे सुनने लगा हूँ
कि
मैं अब पहले की तरह नहीं रहा,
बदल गया हूँ….
मुझे शक़ होने लगा आईने पर
आज झिंझोड़कर जब उससे सवाल किया
तो देखा वो भी
ज़माने वालों की तरह
अपनी कालिख दीवार पे छुपाकर
देखने वाले की कमियाँ
बतलाने का हुनर रखता है….
कितना बेहतर होता
शीशा-ए-दिल में गर देखना आ जाता।
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संपर्क : 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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