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विमोचन : ‘मुझे सत्ता नहीं रोटी चाहिए/हिकारत और एहसान के दर्प में लिपटी नहीं/हक और आत्मीयता के ताप में पकी हुई/और इस रोटी के लिए सत्ता चाहिए/जिसमें सबके हिस्से की अपनी रोटी हो…’ : इन पंक्तियों के कवि घनश्याम त्रिपाठी का ‘ समुद्र को बांधना अभी शेष है’ के बाद ‘ जो रास्ता संघर्षमय होता है’ का विमोचन

👉 [बाएँ से] घनश्याम त्रिपाठी, कैलाश बनवासी, प्रो. सियाराम शर्मा, मदन कश्यप, नासिर अहमद सिकंदर, मीता दास, वासुकि प्रसाद ‘ उनमत्त’ और एन. पापा राव
भिलाई [छत्तीसगढ़ आसपास न्यूज : कल्याण महाविद्यालय सभागार : 21 जनवरी] :
प्रगतिशील कवि घनश्याम त्रिपाठी का ‘समुद्र को बांधना अभी शेष है’ 2014 में आई थी. अब उनके नए संग्रह जो रास्ता संघर्षमय होता है का विमोचन और समीक्षा गोष्ठी के मुख्य अतिथि चर्चित कवि दिल्ली से आए मदन कश्यप और अध्यक्षता जनवादी कवि नासिर अहमद सिकंदर थे.
आलेख कथाकार कैलाश बनवासी और वक्ता थे प्रो. सियाराम शर्मा, मीता दास, वासुकि प्रसाद ‘ उन्मत्त’ और एन. पापा राव.
कार्यक्रम के शुभारंभ के पूर्व अतिथियों का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया गया.

हमारे समय को अपनी संजीदगी, सादगी, साफगोई और मार्मिकता से दर्ज करती इस दौर के उम्दा और महत्त्वपूर्ण कवि घनश्याम त्रिपाठी ने अपने कविता संग्रह ‘ जो रास्ता संघर्षमय होता है’ से कुछ चुनिंदा कविताओं का पाठ किया. ‘ मेरा राष्ट्रप्रेम’/’ आँखें हमारी है’/’महादेव मजदूर’/’साथ- साथ’ और ‘ राजतंत्र का अवतरण’.

👉 कृतिकार घनश्याम त्रिपाठी
मदन कश्यप ने कहा-

इस समय हिंदी कविता अपनी सामूहिकता में ढलान की ओर जा रही है. ऐसे में संघर्ष और विचार के साथ घनश्याम त्रिपाठी आगे बढ़ रहे हैं, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए. वे हमारे समय के सार्थक कवि हैं. उनकी कविताओं में शुरू से आखिरी तक वैचारिक संघर्ष दिखाई देता है.
नासिर अहमद सिकंदर ने कहा-
घनश्याम त्रिपाठी ने अपनी कविताओं में बदलते समय के नए यथार्थ को संजीदगी से पकड़ा है. किसानों और मजदूरों पर जो शोषण और दमन की चक्की चलाई जा रही है, कवि अपनी कविताओं में उसका पर्दाफाश करते नज़र आता है.
कैलाश बनवासी ने कहा-
दूसरे कविता संग्रह में घनश्याम त्रिपाठी अधिक मुखर और राजनीतिक चेतना सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं. उनकी कविताएँ सहज और प्रतिबद्ध हैं, किंतु कुछ कविताएं सपाटबयानी की शिकार हुई हैं.
प्रो.सियाराम शर्मा ने कहा-
घनश्याम त्रिपाठी की कविताएँ मनुष्यता को वापस लौटाने की कविताएं हैं. उनकी कविताओं में हमारा समय और समाज पूरी तरह से उभरकर सामने आता है. उनके शब्द और संवेदना में कोई दूरी नहीं है.
मीता दास, वासुकि प्रसाद ‘ उनमत्त’ और एन. पापा राव ने भी कहा –
घनश्याम त्रिपाठी की कविताएँ सशक्त हैं. कवि समाज के अंतिम आदमी के संघर्ष में शामिल दिखाई पड़ता है.
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विमोचन समारोह में उपस्थित हुए –

‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य, ‘ छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ’ के राज्य महासचिव एवं ‘प्रलेस’ भिलाई-दुर्ग के अध्यक्ष परमेश्वर वैष्णव, ‘प्रलेस’ भिलाई-दुर्ग के सचिव विमलशंकर झा, ‘बस्तर बस्तर’ उपन्यास के चर्चित लेखक लोकबाबू, प्रगतिशील कवि शरद कोकास,इंदु शंकर मनु, छ्गनलाल सोनी, शायर मुमताज, कथाकार विजय वर्तमान,पत्रकार शिवनाथ शुक्ल, प्रशांत कानस्कर, प्रभात कुमार, कैलाश शर्मा, अभिनेष सुराना, बृजेन्द्र तिवारी, निमाई प्रधान, सुलेमान खान, गोरखनाथ सिंह, आर पी राजेंद्र, चित्रकार गिलबर्ड जोसेफ, ‘अपना मोर्चा ‘ के प्रमुख राजकुमार सोनी, ‘ जन संस्कृति मंच भिलाई-दुर्ग ‘ के अध्यक्ष अभिषेक पटेल और सचिव सुरेश वाहने, अंबरीश त्रिपाठी, विद्याभूषण,कवियत्री शुचि भवि और अनेक प्रबुद्धजन.
कल्याण महाविद्यालय के सहयोग से आयोजित इस समीक्षा गोष्ठी का संचालन अशोक तिवारी और आभार व्यक्त ‘ जन संस्कृति मंच भिलाई-दुर्ग ‘ के सचिव सुरेश वाहने ने किया.
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