बाल कविता : कमलेश प्रसाद शर्माबाबू [कटंगी-गंडई, जिला- केसीजी, छत्तीसगढ़]
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साबुन
सुघ्घर-सुघ्घर प्यारा साबुन।
सबके हवय दुलारा साबुन।।
बढ़िया काम आथे साबुन।
साफ सफाई बनाथे साबुन।।
रंग-बिरंग के आथे साबुन।
खुशबू दे ममहाथे साबुन।
बड़ मया बरसाथे साबुन।
कीटाणु दूर भगाथे साबुन।।
कपड़ा ल उजराथे साबुन।
शरीर स्वच्छ बनाथे साबुन।।
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नाश्ता
सोनू मोनू बबली छोटी।
खाथे सबझन डबलरोटी।
पों-पों,पों-पों वो बजावय ।
रोज बिहँन्चा ले बलावय।
नान्हे- नान्हे छोटे लइका ।
धरय नही थोरको सँइता।
नाच-नाच के वोमन खाथें।
थोरिक मा ही रिसा जाथें ।
पोहा मैगी व नूडल पास्ता।
आनी-बानी के आगे नास्ता।
नंदावत बबरा फरा चिला।
खावँय सबझन माई पिला ।
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•99775 33375
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chhattisgarhaaspaas
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