कविता
6 years ago
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●आओ ! बंद कमरे में बैठें
-विजय पंडा
-घरघोड़ा, रायगढ़,छत्तीसगढ़
खुली जगह ,खुली मैदान में
घुटन होने लगी।
श्वासें भी जहरीली हो गयी,
विश्वास की धागे में
फूल अब गूथें नही जा रहे,
संस्कारित कपास अब उग नही रहे,
मिट्टी , तन – मन
अब रसायन जो खाने लगे।
लोग अब इठलाने में मस्त
बन्द कमरों पर बन्द होंठ ;
खिलखिलाने पर लगा गश्त
हरी दूब मुरझाने लगे ;
गमलों में लगे सुमन ही
प्रिय लगने लगे ,
अब ;
दालान आँगन गाँव उपवन
की शायद जरूरत नही।
गर्म चाय की कप को भी
प्लेट ढूँढना मंजूर नही ,
तनिक सा इंतजार दूसरों का सत्कार ,
सेहत के लिए ठीक नही ;
स्नेह वात्सल्यता की घड़ी रही नही
दीवाल खड़े हो गए आँगन में
दहक रहे अंगारे नसों में
बिक रहे सब बाजारों में
आओ!
बन्द कमरे में बैठें।
chhattisgarhaaspaas
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