आरंभ की अंतर्ध्वनि- 1 : दीप्ति श्रीवास्तव

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आरंभ की अंतर्ध्वनि
– तारकनाथ चौधुरी
[ संपादक एवं संयोजक ]
• स्तम्भ उद्देश्य-
साहित्य केवल शब्द नहीं, समय का साक्ष है. इस नवीन स्तम्भ का उद्देश्य नवोदित और स्थापित रचनाकारों को एक साझा मंच देना है, जहाँ कविता और कहानी के माध्यम से जीवन, समाज और मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति हो सके. यह स्तम्भ शब्दों की यात्रा है- जो पाठक को केवल पढ़ने नहीं, महसूस करने और सोचने के लिए प्रेरित करे. हमारा प्रयास रहेगा कि हर रचना में साहित्यिक सौंदर्य के साथ-साथ जीवन का एक नया ‘आरंभ’, एक नई अंतर्ध्वनि सुनाई दे. इस स्तम्भ में मौलिक कविताएं और कहानियां, नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन एवं साहित्यिक संवाद और विमर्श होगा. सृजन कभी समाप्त नहीं होता, वह हर बार एक नए ‘आरंभ’ के साथ जन्म लेता है.
पहले अंक का ‘आरंभ’ दीप्ति श्रीवास्तव की दो कविता ‘बारिश की आवाज’ और ‘धूप छाँव’ से की जा रही है. रचनाएं इस स्तम्भ के लिए संयोजक-संपादक तारकनाथ चौधुरी के इस व्हाट्सएप नंबर – 83494 08210 पर ही भेजें. स्वीकृति के पश्चात ही इस स्तम्भ में प्रकाशित की जाएगी. – प्रदीप भट्टाचार्य, मुख्य संपादक
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• बारिश की आवाज

ऊपर वाले की बारिश
कभी आवाज नहीं करती
बादलों की आड़ में रहमत छुपी
सुखदुःख की बौछार करती
गरज चमक के साथ बारिश नहीं होती
दुःख सांय सांय हवा को मात देती
सुख बादलों की ओट में छुप
करता आंख मिचोली
सूरज सी गर्मी जीवन को दुष्कर बनाती
टप-टप करते सुख दुख
कभी हंसाते कभी रुलाते
जिंदगी का खेल हिलमिल खिलाते
यदा कदा निराशा के बादल छा जाते
दुख पालथी मार आराम फरमाता
उसके सामने सुख क्षणिक सा लगता
मनुज उस बारिश की राह देखता
जो सुख की हरियाली लाता
जीवन में ऊपर वाले की
बारिश की आवाज नहीं होती
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• धूप छाँव

धूप छाँव धूप छाँव
बादल खेल रहे थे
गर्मी में अचानक
मौसम की यह निराली चाल
मौसम विभाग हैरान परेशान
किसने इन बादलों को दी रिश्वत
या कहीं विदेश से तो नहीं आ रही फंडिंग
भ्रष्टाचार सीमा लांघ
बने देश के दुश्मन चार
नमी देख काकरोच पनपा
कुनबा उसका बढ़ गया
अराजकता फैलना उसकी मनसा
पीठ अपनी थपथपाता
मिडिया वाले पीछे दौड़ते
पहले न्यूज पाना चाहते
टीआरपी की पहली लड़ाई
देश बाद में मेरे भाई
गर्मी का रौद्ररूप बादलों ने ढंका
बादलों ने गर्मी को कम आंका
बादल ठहर ना सका
ढेरों बादल सूरज ढंकने आये
उसके ताप को सह ना पाये
फिर चला लांछन का दौर
फिर भी सूरज था सिरमौर
कितनी भी तरकीब लगालो
दूसरों पर इल्जाम मढ़ डालो
सूरज का घोड़ा बादलों
के खेल लुकाछिपी में नहीं फंसा
राजनीति है ऐसा ही फंदा।
• कवयित्री संपर्क-
• 94062 41497
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chhattisgarhaaspaas
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