आरंभ साहित्यिक मंच : डॉ. दीक्षा चौबे

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• गीत {1}

खेत-बावली बाड़ी आँगन, ठाँव नहीं खोने देना।
पुरखों की अनमोल धरोहर, गाँव नहीं खोने देना।।
घर-घर मिलता नेह-निमंत्रण, अपनापन संबंधों में।
रिश्तों की लहराती बगिया, दिखते आज निबंधों में।
काकी दादी की कहानियाँ, जीना हमें सिखातीं थीं।
कटोरियाँ सब्जी की घर-घर, हरदम आती-जाती थीं।
खेतों की मेड़ों पर चलते, पाँव नहीं खोने देना।।
पुरखों की अनमोल धरोहर, गाँव नहीं खोने देना।।
मात-पिता के शुचि चरणों में , दुनिया का सुख मिलता था।
कठिन परिश्रम के तालों में, सौभाग्य-कँवल खिलता था।
त्याग सभी इच्छाएँ अपनी, पाला राजकुँवर जैसे।
जिन हाथों ने दिया सहारा, बोझ हुए सुत पर कैसे।
वट की शीतल छाया जैसी, छाँव नहीं खोने देना।।
पुरखों की अनमोल धरोहर, गाँव नहीं खोने देना।।
सरल सहज व्यवहार लुटाते, खोए सब रिश्ते-नाते।
बंद हुआ घर आना-जाना, त्योहार न पर्व लुभाते।
परिचय नहीं पड़ोसी से पर, मित्र कई हैं आभासी।
सात जन्म का चिर गठबंधन, टिक पाए क्या चौमासी।
संस्कारों को रक्षित करता, दाँव नहीं खोने देना।।
पुरखों की अनमोल धरोहर, गाँव नहीं खोने देना।।

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• गीत {2}

अंतर्मन में झाँकें खुद ही, देख नहीं कोई पाएगा ।
तुम्हें अकेले जाना जग से , साथ नहीं कोई जाएगा ।।
कमियों का सागर मानव तन ,
कंटक मार्ग के छाँटता जा ।
दुःख को अपने साथ रखना ,
मन की खुशी को बाँटता जा ।
काम किसी के आ जाओ तो ,वह आजीवन गुण गाएगा ।।
तुम्हें अकेले जाना जग से , साथ नहीं कोई जाएगा ।।
छल दंभ मद-मोह में पड़कर ,
जीवन भर तू सबको छलता ।
सुविधा-स्वार्थ के आस्तीन में ,
छल का दंभी अजगर पलता ।
दुर्गुण का घुन पनप न पाए, यह सत्कर्मों को खाएगा ।।
तुम्हें अकेले जाना जग से, साथ नहीं कोई जाएगा ।।
आत्म-नियंत्रण की छेनी से ,
मन के पाहन को तराश ले।
भटक नहीं जीवन के पथ में ,
मानव ईश्वर को तलाश ले ।
मदद करे जो लाचारों की , उसके पीछे सुख आएगा ।।
तुम्हें अकेले जाना जग से , साथ नहीं कोई जाएगा ।।

[ • सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. दीक्षा चौबे प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की प्रबंध-कार्यकारिणी समिति में सक्रिय सदस्य हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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