आरंभ साहित्यिक मंच : डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’

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• चलन दुनियादारी का

वक्त के पांव चुपचाप पहुंचते हैं चालाकी दर तक,
बुलंद आवाज से तमगा लगाता कोई बेबाकी का।
किसी किस्मत पे बट्टा लगा जाता खास अरमानी,
फिर लुत्फ उठाते मकाँ में जश्न मानो दिवाली का।
साजिश अपराध चंगुल सफल है अंगुल दिमाग से,
मेहनत कमाई हो रफूचक्कर या मोटे आसामी का।
चमचागिरि सुविधा ताला खोलते हैं दरबारी बनके,
बस तलवे चाट ऐशो आराम चलन दुनियादारी का।
जीवन रथी को सुगम अगम दुर्गम पथ में बदहाली,
भला दिल भी ना पसीजे और अश्रु घड़ियाली का।
दूर दराज देहात से शहर तक नव पीढ़ी बेगारी देख,
तर्क होड़ शौक संग अर्ज मर्ज़ फ़र्ज़ में रुस्वारी का।
नाम कमाता गलियारा और सदन की चार मीनारी,
बिगड़े शहजादों का विरोध इशारा लगे बीमारी का।
चाल ढाल डील डौल लहजा ढांचा रईस बुनियादी,
जेहन समाया रिश्ता भी निभे सरकारी दामादी का।
दुनिया में बिरले हैं दशरथ राम भरत सम जज्बाती,
दिखावा कागज फूल से सुगंध विहीन नाराजी का।
नादान दिखने रहने को शोख अदा में घिरा नादानी,
तकदीर लिखवा के आए कोई मेलों में वीरानी का।
ढोल पीटते पोल खोलते हैं सब अपनों की नाकामी,
वक्त के माथे पे विजय तिलक लगता नायाबी का.

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• सत्ता शुचिता शोर
[ शायरी कविता ]

सत्ता बवाल दौर अब कमाल का अभ्यस्त हुआ,
परदे परे करामाती चरित्र पतन बुतपरस्त सा है।
बेखौफ करतब प्रेमीजन का पूरा सरपरस्त हुआ,
खजाना सात पुश्त लूटमार करने मदमस्त सा है।
गाड़ी बंगला एशो आराम मार्ग बेजा दुरस्त हुआ,
अपराधी स्वभाव कुरुक्षेत्र रण में शिकस्त सा है।
अपने ही गढ़ का भगदड़ माहौल भयग्रस्त हुआ,
नामित नेतागण महादल शरण में विश्वस्त सा है।
आसमान से जमीन यात्रा दुनिया में प्रशस्त हुआ,
अर्श से रसातल दुकान जमघट अलमस्त सा है।
घर समाज वतन बटवारे में कोई सिद्धहस्त हुआ,
जागीर बागडोर थमाने लौह युग वरदहस्त सा है।
जान फूंकने और देने में किरदार दिलचस्प हुआ,
बेड़ियों से आत्मनिर्भर आजादी जबरदस्त सा है।
कानून जाति धर्म समानता नियम बंदोबस्त हुआ,
सत्ता शुचिता शोर सार ’मुन्ना’ मौकापरस्त सा है.

[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य एवं प्रबंध समिति में कार्यकारिणी कमेटी के मेंबर डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’ 1995 से लेखन शुरू किया, अब तक सात काव्य संग्रह प्रकाशित हुई. • हाल ही में इनकी प्रकाशित काव्य संग्रह है- ‘सृजन पल का काव्यकुंड’. ]
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